दल Opinion 

दल -दल यानी सभी दलो का गठ बन्धन ।

देश २०१९ के चुनाव की तैयारी में लगा है। सभी दल अपने अपने जुगाड़ में लग गये है। जी जान से कोशिश की जा रही है सत्ता मिल जाए। अर्जुन जैसे सबकी आँख प्रधान मंत्री कि कुर्सी पर है। जैसे  बारिश का आभास होते ही मेंढक फुदकने लगते है । कुछ वैसा ही भारतीय राजनीति का हाल है। दल-दल नही ,सभी दल मिलकर एक महगठबंधन की योजना बना रहें है। सभी दलों का बस एक ही नारा है कि वर्तमान सरकार जो पूर्ण बहुमत वाली सरकार है उसे हटाया जाए। सभी दल और उनके नेता अपने अपने बयान जारी कर रहें है। मज़े की बात तो यह है की सभी दलों के प्रमुख ह्रदय से प्रधान मंत्री बनना चाहतें है अब वो चाहे दीदी हो या बहनजी .बबुआहो या युवराज। प्रधानमंत्री बनने का सपना सभी देख रहें है और ना नुकूर भी कर रहें है.एक हिम्मती नौजवान जिन्हें गद्दी विरासत मेंमिलनी चाहिए थी पर अब वो इसके लिए जी तोड़ मेहनत कर रहें है उन्होंने तो मंच से घोषणा भी कर दी है। पार्टी अथवा अपने सहयोगियों से सलाह मशवरा किए बिना ही ख़ुद को प्रधान मंत्री घोषित कर दिया है। आज ही दीदी का सुझाव भी आया है कि बिना किसी नाम या चेहरे के सारे दल मिलकर चुनाव लड़ें। मोदी को किसी भी तरह हटायें बाक़ी बाद में देखा जाएगा। कर्नाटक में देखा नही क्या। वहाँ के मुख्यमंत्री भरी सभा में रोते है पर कुर्सी तो प्यारी है सो गठबंधन की सरकार चला रहें है। अब सोचने वाली बात ये है की भिन्न भिन्न विचारधारा वाले लोग शायद एक मंच पर आ भी जाएँ। किसी तरह सरकार भी बना लें पर देश के भविष्य का क्या? क्या कोई ठोस नीति बन पाएगी? वो प्रधान मंत्री जो सहयोगी दलों की दया पर टिका होगा कभी कोई ठोस क़दम देश हित में ले पाएगा। प्रधान मंत्री, उप प्रधान मंत्री, नेता, उपनेता बस इसी में उलझे रहेंगे। रूठना मनाना चलता रहेगा। दस या बीस दल जो भी गठबंधन के सहयोगी होंगे सभी सत्ता का सुख चाहेंगे। ऐसे में तो कोई उज्जवल भविष्य देश का दिखता नही है। तो समाधान क्या हो? कहीं ऐसा तो नही होगा की दल दल में कमल खिल जाएगा । या फिर देश कठपुतली प्रधानमंत्री के हाथ में आ जाएगा। देश के हित की यदि थोड़ी भी चिंता हो तो इस बार मतदान करने से पूर्व अत्यधिक मनन की आवश्यकता होगी। अन्यथा देश का क्या होगा ,कौन सी ताक़तें देश को चलायेंगीं कुछ पता नही। पर एक प्र्श्न फिर भी यक्ष प्र्श्न जैसा है । क्या ये स्थिर सरकार बहुत ही  निराशाजनक प्रदर्शन कर रही है? देश में विकास की गति कैसी रही है? विदेशों में हमारी साख बढ़ी है क्या? और इस सरकार के स्थान पर जो बीस दलों वाली सरकार हम चुनेगें क्या वह बेहतर विकल्प हॉगा या फिर देश को एकअस्थिर सरकार को सौपने जा रहें हैं। Usha Kedia

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परिवारवाद में उलझी भारतीय राजनीति

जब देश आज़ाद हुआ था तब बस एक ही पार्टी थी कोंग्रेस ! दो नेता थे गांधीजी और नेहरू जी. गांधी जी के वारिस राजनीति से दूर ही रहे पर नेहरू परिवार “देश सेवा” में लगा रहा. आश्चर्यजनक ये था कि नेहरू की बेटी इंदिरा जी थी वो पारसी फ़िरोज़ से ब्याहीं गई थी. ये अपने नाम के साथ पता नही कैसे “गांधी ” जोड़ने लगीं। अधिसंख्य अनजान लोग इन्हें महात्मा गांधी के वारिस मानने लगे। और कोंग्रेस पार्टी इसी गांधी परिवार की राजनीतिक दुकान हो गई या कहे प्राइवेट कम्पनी. पीढ़ी दर पीढ़ी कोंग्रेस पर इनका राज रहा. नेहरू,इंदिरा,संजय,राजीव ,सोनया और अब हमारे राहुल जी हाथ थामे हुए है. ये परिवरवाद धीरे धीरे सभी राजनीतिक दलों में अपनी जड़ें ज़माने लगा. महाराष्ट्र में शिवसेना को देखें तो वह ठाकरे परिवार की कम्पनी है. बाला साहब के बाद उत्तराधिकारी बने उद्धव जी जबकि योग्य थे राज ठाकरे यू.पी. मी मुलायम यादव ने अपनी साइकल चलाई और फिर अपने परिवार को थमा दी. अर्थात समाजवादी पार्टी अबअखिलेश जी की है. हरियाणा में भी यही है है यहाँ एक चौटाला परिवार है जिसका सारा कुनबा लोक दल को थामे हुए है. पहले ताऊ देवीलाल फिर ओम् प्रकाश चौटाला ,अजयऔर अभय जी और अब नयी पीढ़ी के कर्ण धार दुश्य्न्त . बिहार का हाल भी यही है. लालू जी की अपनी निजी पार्टी है. वो जेल जाते समय अपनी पार्टी में किसी की योग्यता पर भरोसा नही करते. अपनी लालटेन अपनी अनपढ़ सी घरेलू स्त्री राबड़ी जी को ही थमाते ह जिसे अब तेजस्वी जी रोशन कर रहें है. जहाँ देखो ,जिस राजनीतिक पार्टी को देखो किसी का लोक तंत्र से कोई लेना देना नही है. सब अपना परिवार पाल रहे है. ना तो देश की चिंता है ना ही राज्य की फ़िक्र. पार्टी में कितने भी योग्य लोग हो जब बात सत्ता के हस्तान्तरण की आती है तब बस परिवार प्रधान हो जाता है और योग्यता गौण. शायद यही कारण है कि लोक तंत्र की जड़ें प्रत्येक स्तर पर खोखली होती जा रही है क्यूँकि परिवार तन्त्र महत्वपूर्ण हो गया है. अब समय आ गया है राजनीतिक दलो के प्रभाव शाली ,योग्य नेता गण अपनी महत्व पूर्ण भूमिका की माँग करें. राजनीतिक दल देश सेवा के लिए बनाए जाते है इन्हे किसी परिवार विशेष की निजी सम्पत्ति बनने से रोकना होगा. केवल देश में ही नही दलों में भी एक मज़बूत लोकतांत्रिक वातावरण होना चाहिए तभी देश की राजनीति का स्तर ऊपर उठ सकेगा. Usha Kedia

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कविता हिन्दी लेख 

राजनीतिक दलों से ऊँचा होता नेताओं का क़द!!

आज हमारे देश की राजनीति एक अलग ही दिशा में मुड़ गई है, एक नयी करवट ले रही है| आज ये दल अपनी पहचान खोते जा रहें है, पहले इन दलों की पहचान इनकी नीति से होती थी कि कौन सा दल किस का अनुसरण करता है| पर आज पार्टियाँ अपने नेता के नाम से ही जानी जाती है, प्रत्येक दल में एक ऐसा नेता होता है जिसकी सुनी जाती है ,बस वही सर्वे सर्वा| किसी एक पार्टी की बात नही है, राष्ट्रीयदल हो या क्षेत्रीय पार्टियाँ सब में एक ऐसा नेता होता है जिसका क़द पार्टी से भी ऊपर होता है| अब कोंग्रेस को देखे तो सारे दिग्गज नेता किनारे पर बैठें है, बस सब राहुल जी की सुनते है और वो क्या क्या कहते हैं विचारणीय है| भारतीय जनता पार्टी जब जनसंघ हुआ करती थी तब एक मज़बूत लोकतांत्रिक दल था, बड़े बड़े धुरन्धर नेताओ की लम्बी लाइन थी पर अब यहाँ भी बस मोदीजी और अमित शाह के मन की बात सुनी जाती है| पहले तो राजनीति परिवारों ने सम्भाली पर अब तो सब अपनी अपनी दुकान खोले बैठे है, सब को कुर्सी का मोह है| किसी भी सांसद या विधायक को यदि कोई पद नही मिलता वो बस अपना एक अलग दल बना लेता है और उस पार्टी को उसीव्यक्ति के नाम से जाना जाता है, अब मायावती की बहुजन समाज पार्टी में बस बुआ जी की ही चलती है तो समाज वादी में बस अखिलेश जी साइकल चला रहें हैं| बंगाल को दीदी सम्भाले बैठी है तो दिल्ली को केजरीवाल जी, जहाँ ,जिधर भी देखे सभी पार्टियाँ बस एक ही नेता पर निर्भर हो गई है| सारी योजना ,नीतियाँ सब उसी के अदेशानुसर, कोई दल लोकतांत्रिक तरीक़े से नही चल रहा| सब की दृष्टि बस कुर्सी पर टिकी है येन केन प्रकारेंन बस सत्ता सुख मिल जाए, तो अब हमारे देश की राजनीति धीरे धीरे तानाशाही की ओर बढ़ रही है| विकल्प कोई है नही देश के पास, अब कोई जयप्रकाश जी जैसा आए और देश को सही राह पर ले जाए अन्यथा तो इनको ही सौपनी है पतवार| देश की नैया अब डूबने से कौन बचाये? Usha Kedia

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Opinion Social Media कविता हिन्दी लेख 

हम भारत के लोग ……

हम भारतवासी अपने पूरे होशों हवास में शपथ लेते हैं कि हम भारत को अखण्ड नही रहने देंगे ! हम भारत वासी शपथ लेते हैं की देश हित का सोचने वालों को मरने पर विवश कर देंगे. पूरे सोच विचार के पश्चात हम भारत के लोग यह प्रण लेते हैं की अपने हितो पर देश हित की बलि चढ़ाने में संकोच नही करेंगे. हम बस उसी पार्टी की सरकार बनाने में सहयोग करेंगे जिससे हमारे स्वार्थ सिद्ध होंगे. हम भारतवासी पूरा प्रयास करेंगे कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त ना हो सके. साफ़ सुथरी सरकार और ईमानदार नेता हमारी राह के रोड़े हैं. सही ग़लत की परवाह किए बिना हम चन्द रूपयों में अपना वोट बेच देंगे. हम सभी भारत के लोग अपनी पहचान अपने धर्म के आधार पर बताएँगे. जैसे हिन्दू,मुसलमान,सिख या ईसाई आदि. राजनीति भी हम जात पात के आधार पर ही करेंगे. यदि किसी के साथ दुर्व्यवहार होता है या किसी की हत्या हो जाती है तो सबसे पहले उसका धर्म और जाति पूछी जानी चाहिए. हम उसके बाद फ़ैसला करेंगे की दोष किसका है. आप को क्या लगता है? ये अंगर्ल प्रलाप है!! हमारे देश में बस यही हो रहा है. देश की सोचने वालों की बलि ली जाती है. देशद्रोही सरेआम खुले घूमते है. श्री राम कहने वालों को जेल की सज़ा की माँग होती है. हिंदुस्तान मुर्दाबाद , भारत तेरे टुकड़े होंगे. ऐसा कहने वाले मीडिया में हीरो बन गये. कोई दुस्साहस नही करता उन्हें जेल भेजने का. सेना को सर्जिकल की सफ़ाई देनी पड़ती है! आतंकवादियो और पत्थर बाजों पर रहम दिखाया जाता है. सेना को मरने के लिए सीमा पर बिठा रखा है और अलगाववादियों को सर पर. इन हालातों में एक नया शपथ पत्र बन जाना चाहिए . हम भारत के लोग अब देश की सुरक्षा की बात नही करेंगे बस अपना कुनबॉ पालेंगे. जय हिंद कहे या मैं महान ! मेरा स्वार्थ महान . देश बन जाए बे ईमान!!! Usha Kedia

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News Opinion हिन्दी लेख 

हड़ताल की जाँच पड़ताल

हमारे शहर के सफ़ाई कर्मचारी कई दिनों से हड़ताल पर है. शहर की साफ़ सफ़ाई पहले भी बहुत अच्छी नही थी पर अब तो हालात बदतर हो गये है. हड़ताली कर्मचारियों की अपनी यूनियन है तो बाहर वालों को बुला कर भी सफ़ाई नही करवा सकते. थोड़ा प्रयास किया गया था पर बाहर वालों को काम नही करने दिया गया. अपने देश में हड़ताल का अभिप्राय यही है “काम रोको”! स्कूल या कॉलेज में हड़ताल होती है तो छात्र सड़कों पर उतर आते है. तोड़ फोड़, सरकारी सम्पत्ति के साथ…

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Opinion हिन्दी लेख 

दो नावों की सवारी, किस पर पड़ती है भारी!!

हमारे देश की राजनीति के कुछ अलग से क़ानून क़ायदे हैं. हमें बचपन से सिखाया जाता है की दो नावों की सवारी करने वाला अक्सर डूब जाता है. पर भारत में बड़े बड़े नेता बड़ी शान से दो नावों की सवारी करते है और पार उतर जाते हैं. डूबता है तो जनता का पैसा और समय भारी पड़ती है हम सब पर. आप अक्सर लोक सभा और विधान सभा चुनावों के समय देखते है कि सभी बड़े बड़े दिग्गज नेता दो सीटों पर चुनाव लड़ते है. कभी तो दोनो सीटों…

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Opinion हिन्दी लेख 

हिंदुस्तान और पाकिस्तान की बराबरी!! कभी नही!

हिंदुस्तान बस हमारा हिंदुस्तान है. इसकी तुलना किसी से नही की जा सकती. पाकिस्तान से तो बिलकुल नही. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र, तेज़ी से विकास करता हुआ, सारी दुनिया पर अपनी एक अच्छी छवि बनाता हिंदुस्तान. एक परिवार या बड़े कुनबे सा पसरा हुआ, सभी धर्मों को समेटे हमारे हिंदुस्तान को किसी परिचय की कोई आवश्यकता नही है. दूसरी ओर हिंदुस्तान से छिटक कर गिरा ज़मीन का एक टुकड़ा पाकिस्तान जों बस आतंक का पर्यायवाची है. यहाँ आतंक और नफ़रत की फ़सल बोई जाती है, जिसे हम हिंदुस्तानियों के…

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जनादेश या जुगाड़ु आदेश!

कर्नाटक का नाटक समाप्त हो गया. सबसे बड़ी पार्टी ने दावा किया कि जनादेश हमारे पक्ष में है और बिना नम्बरों के फुर्ती में सरकार बना ली. दो घोर विरोधी दल जो एक दूसरे का विरोध करते हुए चुनावी मैदान में उतरे थे, चुनावों का परिणाम आते ही एक हो गये. जनादेश को उन्होंने जुगाड़ू आदेश बना लिया. अब इनकी सरकार बनेगी. जनता का फ़ैसला ही कुछ ऐसा था. पर जनता भी क्या करे. कोई दूध का धुला नही है तो वोट बिखर जाते है. बहुत ख़राब और कम ख़राब…

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वाराणसी पुल दुर्घटना – हादसा या हत्या!!

ये जो वाराणसी में १८ लोग मारे गये ये सीमा पर शहीद नही हुए और ना ही ये किसी आतंकवादी की गोली का शिकार हुए है। इनका क़सूर बस इतना था कि ये अपने घरों से निकल कर बनारस की सड़कों पर आ गये थे। ये जो हादसा हुआ, इस प्रकार के हादसे हमारे देश में आए दिन होते हैं। कभी राजधानी दिल्ली में तो कभी हमारे मोदी जी के शहर में और योगी जी के राज में। इन हादसों की किसी की कोई ज़िम्मेदारी नही है। कुछ अफ़सर ससपेंड होते…

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कमल ने किया कमाल, पर रह गया मलाल!

बीजेपी ने कर्नाटक जीत लिया। कमल ख़ूब खिला। अमित शाह और मोदी की जोड़ी ने कमाल कर दिया। पर थोड़ा मलाल तो रह गया। काश आँकड़ा कुछ आगे बढ़ गया होता। काश कमल  ११२ को छू लेता, ख़ुशी दुगनी हो जाती। पर क्या अफ़सोस करना!ये हमारे देश की राजनीति है। यहाँ नम्बर गेम चलता है। दो सीटें जीतकर जो पार्टी अपनी सरकार बना सकती है उसके पास अब तो १०८ है। साम, दान, दण्ड और भेद। राजनीति के हथियार है। सब अपनाए जायेंगे।दूसरी ओर JDS  सरकार बनाने को बेक़रार है।…

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