जनादेश या जुगाड़ु आदेश!
कर्नाटक का नाटक समाप्त हो गया.
सबसे बड़ी पार्टी ने दावा किया कि जनादेश हमारे पक्ष में है और बिना नम्बरों के फुर्ती में सरकार बना ली.
दो घोर विरोधी दल जो एक दूसरे का विरोध करते हुए चुनावी मैदान में उतरे थे,
चुनावों का परिणाम आते ही एक हो गये.
जनादेश को उन्होंने जुगाड़ू आदेश बना लिया.
अब इनकी सरकार बनेगी.
जनता का फ़ैसला ही कुछ ऐसा था.
पर जनता भी क्या करे.
कोई दूध का धुला नही है तो वोट बिखर जाते है.
बहुत ख़राब और कम ख़राब में से चुनाव करना हो तो ऐसा जनादेश ही आएगा.
और फिर जुगाड़ की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
हमारे हरियाणा में लोग एक गाड़ी बनाते है.
उसका नाम जुगाड़ ही है.
उसमें ट्रैक्टर के पहिए, लकड़ी का ढाँचा और ट्रक के स्टीरिंग के साथ किसी पुराने जनरेटर का इंजन लगाया जाता है.
आजकल लगभग सभी राज्यों में जनादेश की अवहेलना कर इसी जुगाड़ से सरकारें बन रही है.
जिन्हें येन केन प्रकारेंन बस सत्ता हासिल करनी है.
ना तो जनता के विकास से कोई उन्हें मतलब है नही जनता के आदेश से.
बस कुर्सी मिल जाए.
फिर पाँच साल की मौज पक्की.
और जनता और उसका जनादेश इस जुगाड़ के समक्ष बेबस है.
हर बार ठगी सी रह जाती है तो एक बार और यही हुआ है.

