दो नावों की सवारी, किस पर पड़ती है भारी!!
हमारे देश की राजनीति के कुछ अलग से क़ानून क़ायदे हैं.
हमें बचपन से सिखाया जाता है की दो नावों की सवारी करने वाला अक्सर डूब जाता है.
पर भारत में बड़े बड़े नेता बड़ी शान से दो नावों की सवारी करते है और पार उतर जाते हैं.
डूबता है तो जनता का पैसा और समय भारी पड़ती है हम सब पर.
आप अक्सर लोक सभा और विधान सभा चुनावों के समय देखते है कि सभी बड़े बड़े दिग्गज नेता दो सीटों पर चुनाव लड़ते है.
कभी तो दोनो सीटों पर जीत जाते है और कभी एक पर.
जब दो स्थान से विजय हासिल होती है तो वे शान से एक सीट से त्यागपत्र दे देते है.
और अगर एक सीट से जीतते है तो भी उन्हें कोई फ़र्क़ नही पड़ता.
अर्थात ये दो नावों की सवारी उन पर नही पड़ती भारी.
तो फिर किस पर भारी पड़ती है !
नेताजी के जीत जाने के पश्चात ख़ाली बची सीट पर फिर से चुनाव होता है.
सारी सरकारी कार्यवाही, प्रचार प्रसार, नामांकन और भाषण बाज़ी.
सारी प्रक्रिया फिर से दोहराई जाती है.
नेताजी तो जीत कर चले जाते हैं .
देश के कंधो पर एक अतिरिक्त चुनाव का बोझ आ जाता है.
अब समझ आया न कि ये दो नावों की सवारी किसी और पर नही हम पर ही भारी पड़ती है.
तो अब समय आ गया है.
सब कुछ बदल रहा देश.
देश, सरकार और राजनीति के मायने बदल रहें है तो यह नियम भी बदलना चाहिए.
एक व्यक्ति दो स्थानो से चुनाव लड़े इस पर रोक लगानी चाहिए.
आवाज़ उठानी होगी समझदार लोगों को जिन्हें देश की और हमारी चिंता है.
एक सुझाव भी है!
यदि नेताजी दोनो सीट पर जीत जाते हैं तो एक सीट तो नेताजी ले जातें हैं पर दूसरी!
उस पर उप चुनाव होता है.
तो यह उपचुनाव बंद होना चाहिए और जो दूसरे नम्बर का विजेता हो वह सीट उसे मिलनी चाहिए.
इसके दो लाभ होंगे.
एक तो अनावश्यक चुनाव का बोझ हम पर नही आएगा .
दूसरे एक सीट खोने का डर होगा तो नेताजी अपनी एक ही सीट से लड़ेंगे और दूसरी पर वो अपना मज़बूत उम्मीदवार उतारेंगे.
इस तरह यह दो नावों की सवारी के खेल से देश मुक्त हो सकेगा.

