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आ तो जाऊँ इस जहां में पहले, छू लूँगी उस नीले आसमान को!

नवजात शिशुओं की भ्रूण में हत्याओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 2011 की जनगणना में जहां एक हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 901 थी, वहीं नीति आयोग की हेल्थ इंडेक्स में लड़कियों की संख्या गिरकर 879 पहुंच गई है। आ तो जाऊँ शिशु की पुुुुकार सुुुुनिए।नवजात शिशुओं की भ्रूण में हत्याओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आखिर क्यों उन मासूमों को घर में ही मार दिया जाता है? क्या कोख में ही उनके गुणों – अवगुणों की पहचान कर ली जाती है?

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क्या बिना पैदा हुए ही क्षमताओं को पहचाना जा सकता है? क्या गर्भ में रहते हुए ही उन्हें लड़कों से कमतर आंकना सही है? उस मासूम को तो अभी खुद के अस्तित्व के विषय में भी कुछ पता नहीं है। अभी भ्रूण में तो उसकी उंगलियां विकसित हो रही हैं।

अरे वह तो अभी अपने पलके भी नहीं खोल सकती है।उसके लिए तो उसकी मां का गर्भ ही उसकी सुरक्षित और सुंदर दुनिया है। जिसे वह सिर्फ महसूस करती है। क्या मिलता  है उस मासूम सी बच्ची के भीतर उत्पन्न होने वाली इच्छा शक्ति के पहले ही उसे मार देने से? क्या मिलता है उस मासूम की मुस्कान छीन लेने से? उसकी निर्दोश आत्मा कहीं दूर से अपनी इच्छाओं को पुकारते हुए कहती है-

आ तो जाऊँ इस जहां में पहले,

छू लूँगी उस नीले आसमान को!

बन जाऊँगी मैं गुरूर तुम्हारा,

हौंसला तो दो मेरे पंखों को!

अधिकार तो दो मेरे हिस्से का,

भेज दो मुझे शिक्षा के मंदिर में!

खिल उठेंगी मेरी भी कलियाँ,

महक उठेगा तुम्हारा भी बागान!

आ तो जाऊँ इस जहां में पहले,

छू लूँगी उस नीले आसमान को!

संगीत बना लो मुझे अपने आंगन का,

मधुर गीत गुनगुनाऊंगी!

नयनों की ज्योति बनकर,

सपनों को अन्तरज्योति कर जाऊँगी!

बेटी से औरत बनकर,

माता, भगिनी, भार्या सहित और भी कई रूपों में अपने कर्तव्य को निभाऊँगी!

आ तो जाऊँ इस जहां में पहले,

छू लूँगी उस नीले आसमान को!

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