वाराणसी पुल दुर्घटना – हादसा या हत्या!!
ये जो वाराणसी में १८ लोग मारे गये ये सीमा पर शहीद नही हुए और ना ही ये किसी आतंकवादी की गोली का शिकार हुए है।
इनका क़सूर बस इतना था कि ये अपने घरों से निकल कर बनारस की सड़कों पर आ गये थे।
ये जो हादसा हुआ, इस प्रकार के हादसे हमारे देश में आए दिन होते हैं।
कभी राजधानी दिल्ली में तो कभी हमारे मोदी जी के शहर में और योगी जी के राज में।
इन हादसों की किसी की कोई ज़िम्मेदारी नही है।
कुछ अफ़सर ससपेंड होते है।
कुछ नेता सत्ताधारी दल को कोसते है।
और सत्ता यानी सरकारी महकमा कुछ मुआवज़ा देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है।
क्या बस इतना ही दायित्व है सब का?
कोई नही देखता की वो एक ही परिवार से मरने वाले पाँच लोग किस मनोदशा से गुज़र रहें होंगे?
वो जो इलाज के लिए बड़े शहर आए थे,
वो जो घर से निकले तो पर लौटे नही।
सड़क पर लाशें बिछी है।
कोई चादर डालने वाला नही।
हास्पिटल ले जाओ अपने दम पर, पोस्टमार्टम करवाओ, तब आपके अपनो की लाश मिलेगी।
मानवता शर्मशॉर हो जाती है, सर शर्म से झुक जाता है, जब देखतें है की लाश के पोस्टमार्टम के लिए पीड़ित परिवारों से रिश्वत माँगी जा रही है।
ये हमारे देश में नयी बात नही है।
आम जनता मरे या जिए, कोई नेता नही मरना चाहिए।
उनकी सुरक्षा में कोई चूक नही होनी चाहिए।
अभी बंगाल में कितनी जाने गई है।
औरंगाबाद की आग अभी ठंडी नही पड़ी है।
पर ये सब न्यूज़ का एक हिस्सा भर है!
इन हत्याओं से किसी का मानवीयता का रिश्ता नही है।
यदि सब लोग,
प्रशासन, पुलिस और मीडिया, वास्तव में सहानुभूति रखते तो ये घटनाये केवल कितने मरे और कैसे मरे तक सीमित ना रहे।
सभी की, समाज सेवी संस्थाओ की भी और विरोधी नेताओ की भी ज़िम्मेदारी बनती है,
घायलों को सही उपचार मिले, उन्हें हॉस्पिटल तक शीघ्र ले जाया जाए।
जिन्होंने जान गँवाई है उनको उनके परिजनो को सही तरीक़े से सुपुर्द किया जाए।
ऐसी व्यवस्था हो की लाशों को उनके घर तक निशुलक भेजा जाए।
हम दुःख कम नही कर सकते पर जो सम्भव है वो तो कर सकते है।
अंतिम और पहली ज़िम्मेदारी सरकार की है कि इन हादसों पर यथा सम्भव रोक लगाने का प्रयास करे।
अन्यथा ये हादसे नही, आम जन की हत्या है…

