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इंसान और प्रकृति का समन्वय और ये कविता

इंसान और प्रकृति

सृष्टि की रचना ही इंसान और प्रकृति के सहयोग से मिलकर बनी है। पता यह कहा जा सकता है कि इंसान और प्रकृति एक दूसरे के सामान्य के बिना अधूरे हैं। प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है। तो इंसान का यह दायित्व बनता है कि वह प्रकृति की दी हुई चीजों का सदुपयोग करें और उन्हें हर तरह से सुरक्षित रखने की कोशिश करें।

ऐ इंसान तू क्यों लड़ रहा प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

वृक्ष पर वृक्ष कटवा कर बंद कर ये नव निर्माण, पल भर के डगमगाहट से ढह जाएगा तेरा अभिमान।

प्रकृति के भयानक कहर पर फिर मत चिल्लाना, क्योंकि ये तो है सिर्फ तेरा ही कारनामा।

ऐ इंसान तू क्यों लड़ रहा प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

ना काम आएगा तेरी एसी, ना काम आएगा तेरा एयरफ्रेशनर

साँस के लिए भी थोड़ी जगह छोड़ दे, चल बढ़ चल वृक्षारोपण ओर।

ऐ इंसान तू क्यों लड़ रहा प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

तेरी बेवकूफी का परिणाम सामने दिख रहा, दिल्ली सहित अब हर शहर धुंधमय हो रहा।

देर मत कर वरना फंस जाएगा अपने ही बिछाए जाल में।

ऐ इंसान तू क्यों लड़ रहा प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

असमय वर्षा का हो जाना, हर साल गर्मी में डिग्रियों का तपन की उँचाईयों तक पहुँच जाना।

ये सारी परेशानियों सबकुछ समझकर ना समझ बनने की देन है।

ऐ इंसान तू क्यों लड़ रहा प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

अब तो सीख लो अपनी गलतियों से, जोर दो वन सहित जीवों के संरक्षण पर।

दे दो थोड़ी जगह पौधों को भी अपने घर आँगन में, फिर देखो वायु में स्वच्छता हर ओर फैल जाएगी।

ऐ इंसान अब मत लड़ प्रकृति से, भूल मत तू भी इसी की देन है।

जरूर देखें –मंज़िल दूर है, और रास्ता थोड़ा कच्चा, मगर पहुचना नामुमकिन नहीं

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