परिवारवाद में उलझी भारतीय राजनीति
जब देश आज़ाद हुआ था तब बस एक ही पार्टी थी कोंग्रेस !
दो नेता थे गांधीजी और नेहरू जी.
गांधी जी के वारिस राजनीति से दूर ही रहे पर नेहरू परिवार “देश सेवा” में लगा रहा.
आश्चर्यजनक ये था कि नेहरू की बेटी इंदिरा जी थी वो पारसी फ़िरोज़ से ब्याहीं गई थी.
ये अपने नाम के साथ पता नही कैसे “गांधी ” जोड़ने लगीं।
अधिसंख्य अनजान लोग इन्हें महात्मा गांधी के वारिस मानने लगे।
और कोंग्रेस पार्टी इसी गांधी परिवार की राजनीतिक दुकान हो गई या कहे प्राइवेट कम्पनी.
पीढ़ी दर पीढ़ी कोंग्रेस पर इनका राज रहा.
नेहरू,इंदिरा,संजय,राजीव ,सोनया और अब हमारे राहुल जी हाथ थामे हुए है.
ये परिवरवाद धीरे धीरे सभी राजनीतिक दलों में अपनी जड़ें ज़माने लगा.
महाराष्ट्र में शिवसेना को देखें तो वह ठाकरे परिवार की कम्पनी है.
बाला साहब के बाद उत्तराधिकारी बने उद्धव जी जबकि योग्य थे राज ठाकरे
यू.पी. मी मुलायम यादव ने अपनी साइकल चलाई और फिर अपने परिवार को थमा दी.
अर्थात समाजवादी पार्टी अबअखिलेश जी की है.
हरियाणा में भी यही है है यहाँ एक चौटाला परिवार है जिसका सारा कुनबा लोक दल को थामे हुए है.
पहले ताऊ देवीलाल फिर ओम् प्रकाश चौटाला ,अजयऔर अभय जी और अब नयी पीढ़ी के कर्ण धार दुश्य्न्त .
बिहार का हाल भी यही है.
लालू जी की अपनी निजी पार्टी है.
वो जेल जाते समय अपनी पार्टी में किसी की योग्यता पर भरोसा नही करते.
अपनी लालटेन अपनी अनपढ़ सी घरेलू स्त्री राबड़ी जी को ही थमाते ह
जिसे अब तेजस्वी जी रोशन कर रहें है.
जहाँ देखो ,जिस राजनीतिक पार्टी को देखो किसी का लोक तंत्र से कोई लेना देना नही है.
सब अपना परिवार पाल रहे है.
ना तो देश की चिंता है ना ही राज्य की फ़िक्र.
पार्टी में कितने भी योग्य लोग हो जब बात सत्ता के हस्तान्तरण की आती है तब बस परिवार प्रधान हो जाता है
और योग्यता गौण.
शायद यही कारण है कि लोक तंत्र की जड़ें प्रत्येक स्तर पर खोखली होती जा रही है क्यूँकि परिवार तन्त्र महत्वपूर्ण हो गया है.
अब समय आ गया है राजनीतिक दलो के प्रभाव शाली ,योग्य नेता गण अपनी महत्व पूर्ण भूमिका की माँग करें.
राजनीतिक दल देश सेवा के लिए बनाए जाते है इन्हे किसी परिवार विशेष की निजी सम्पत्ति बनने से रोकना होगा.
केवल देश में ही नही दलों में भी एक मज़बूत लोकतांत्रिक वातावरण होना चाहिए तभी देश की राजनीति का स्तर ऊपर उठ सकेगा.

