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आज का समाज – रेप की खेप!

अख़बार का पहला पन्ना ही शर्मशार होने को काफ़ी है। सर झुक जाता है शर्म से। चारों ओर बस नकारात्मक समाचार,। उनमें भी सबसे अधिक संख्या उन समाचारों की होती है जो हम स्त्री जाति से सम्बन्धित होते है, रेप, बलात्कार।

ना तो इन में धर्म का बन्धन है, ना ही जाति की कोई परवाह। और उम्र तो सात साल की बालिका हो या साठ साल की कोई स्त्री बस दो शब्द यहाँ सटीक बैठते है, नर और मादा। ये दो शब्द हाल बताने को पर्याप्त है।

वो नर है जिसने लूट लिया और जो लुट गई वो मादा।
जिसकी इज़्ज़त लूट ली गई वो किसी भी मज़हब, धर्म, सम्प्रदाय या जाति की हो, यहाँ सब एक है। किसी की बहन बेटी, पत्नी, बच्ची या कोई नौ दस साल की अबोध बालिका हो। हवस के मारों को कुछ नही सूझता।

यह सब हमारे अपने देश में, सभ्य समाज में, आधुनिक भारत में हो रहा है और कश्मीर से कन्या कुमारी तक हो रहा है। जिस देश में कन्या देवी स्वरूप है, वहाँ जैसे दुर्व्यवहार की बाढ़ सी आ गई है। या यूँ कहलें रेप की खेप आ रही है।

पर अख़िर क्यूँ?? कोई तो कमी रह गई होगी हमारी।
हम बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ के गीत गाते रहें।
बेटियाँ बच गई, पढ़ गई और आत्मविश्वास से भर गई। जीवन और समाज के प्रत्येक  क्षेत्र में लड़कों से बराबरी ही नही की अपितु उनसे आगे निकल गईं।

पर बेटे और लड़के, ये हमारे भाई! हमें इनको पालना नही आया। सारी आचार संहिता बस लड़कियों पर थोप दीं। देर सबेर बाहर मत निकलो। छोटे कपड़े मत पहनो। ऐसे मत उठो। यूँ मत बैठो।
धीरे बोलो, ज़ोर से मत हंसों, वग़ैरा वग़ैरा!
पर हमारे बेटों, लड़कों और भाईयों को कुछ नही सिखाया?

काश!  कुछ संस्कार उन्हें भी दिए होते. उन पर भी कुछ बंदिशें लगाईं होती।
कुछ ऊँच नीच उन्हें भी समझाई होत।
तो शायद हालात यूँ बेक़ाबू ना होते।

एक दामिनी थी, एक निर्भया भी हुई थी।
सारा देश उनके हाल पर ख़ून के आँसू रोया था।
पर आज देश के कोने कोने से ऐसे काण्ड होने की ख़बर आ रही है।
क्या करें!
बेटियों को कैसे बचायें?
इससे पहले कि हालात क़ाबू से बाहर हो अपनी आँखे खोलनी होगी।
बेटों को सही ग़लत सिखाना होगा।
अपने घर से ही शुरुआत करनी होगी।
अन्यथा क़ानून तो बनते और टूटते रहेंगे।
एक तो क़ानून वैसे ही अंधा होता है, उस पर क़ानून की आँख में धूल झोंकने वालों की कमी नही!

 

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