कविता शायरी 

किसान

सूखा पड़ा, बंज़र ज़मीन,
उसमें है बैठा एक गरीब।
है आस आंखों में भरी,
जननी है जिसकी बस कृषि।

चेहरे की जिसकी वो हंसी,
बारिश की बूंदों में छुपी,
अपने किसान की जान भी,
धरती के टुकड़े में बसी।

आज़ादी की लड़ी लड़ाई,
हरित क्रांति भी थी आई।
फिर भी प्यासा किसान भाई,
ये कैसी परिवृद्धि आई।

सूख गई ये धरती है या,
सूख गया ये संसार।
पल रहा है जिसके टुकड़ों पर,
उसी को लूट रहा इंसान।

हे अन्नदाता! तुम हो महान,
तुम सा न कोई इस जहान।
सहते हो हर मौसम की मार,
तुम जीवन दाता हो किसान।

Related posts

One Thought to “किसान”

  1. Umang Kaler

    Heart touching

Leave a Comment