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दीक्षा के सहारे मोक्ष की इच्छा!

सूरत से निरंतर समाचार आ रहे हैं। खाते पीते, धनी परिवारों के, पढ़े लिखे युवक और युवतियाँ मोक्ष की इच्छा में दीक्षा ग्रहण कर रहें है। आज जब भौतिकवाद चरम पर है, सभी की हार्दिक अभिलाषा होती है कि उनके पास सारे आधुनिक साधन हो।

ऐसे में जब ब्रैंड के कपड़े पहनना शान माना जाता है और स्मार्ट फ़ोन जीवन की लाइफ़ लाइन! ऐसे में धर्म, स्वर्ग, सन्यास और मोक्ष जैसे शब्द आश्चर्य चकित करते है। सहज ही विश्वास नही होता कि आज लोग स्वर्ग या मन की शांति के लिए सब कुछ त्याग कर वैराग्य ले सकते है।

पर ऐसा हो रहा है! सूरत शहर जो हीरों का शहर है, वहाँ से ये हीरे भी निकल रहे है। इस शहर से पिछले वर्ष से आज तक क़रीब चालीस लोगों ने घर-बार, व्यापार, सब त्याग कर सन्यास लिया है। एक तो पूरा परिवार अपना सर्वस्व दान कर जैन साधु बन गया। एक युवा दम्पति ने अपनी छोटी सी बेटी किसी को सौंप इसी राह को अपना लिया। बारह वर्षीय दीपेश शाह, करोड़पति परिवार का चिराग़ अब तक दीक्षा ग्रहण कर चुका होगा।

अख़िर क्यूँ ये घर परिवार को त्याग रहें है? क्या परिवार में रहते अपने काम सम्भालते धर्म का पालन नही हो सकता? आप के पास यदि पैसा है तो उसका उपयोग दूसरों की सहायता करने में करें। नैतिक मूल्यों को ध्यान में रख कर व्यापार करें। अपनी संतान को संस्कारी बनाए। किसी अनाथ को गोद लेकर उसकी परवरिश करें।

यूँ सन्यास लेना तो शायद जीवन से पलायन हो! और किसी बीस या बारह वर्ष के बालक को अभी दुनिया की समझ ही कितनी होती है? अभी तो ज़िंदगी के उतार चढ़ाव देखे कहाँ है? आज इनका मन वैराग्य की ओर गया है, कल विचलित हुआ तो?

एक उम्र और अनुभव के साथ यदि कोई सोचे कि हाँ अब हो गई दुनिया दारी अब चलो भजन करें, समझ आता है। पर ये नए-नए युवक युवतियाँ, बालक, ये अगर इस तरह दीक्षा ले सन्यास ले रहें है तो कही पलायन तो नही!

इसे किसी भी धर्म या संप्रदाय विशेष से जोड़ कर न देखा जाए।
यह एक साधारण मति की अपनी सोच है। पर ये प्र्श्न अवश्य है कि इस तरह, इस उम्र में मोक्ष के लिए दीक्षा सही है क्या??

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