किरण बेदी- दूषित राजनीति की शिकार
जाओ पहले घर की साफ़ सफ़ाई का ध्यान रखो!
खुले में शौच जाना बंद करो!
तभी राशन मिलेगा।
ऐसा नही लगता कि एक माँ स्कूल से आये अपने बच्चे को आदेश दे रही हो?
जूते उतार कर सही जगह रखो,
हाथ मुँह धो कर आओ, तभी खाना मिलेगा।
माँ समझती है कि उसे भूख लगी होगी पर वह बच्चे में अच्छी आदत डालना चाहती है।
किरण बेदी जी की भी मंशा कुछ यही थी कि आदत में सुधार हो। कोई ग़लती नही थी उनकी।
ऐसा आदेश वही दे सकता है जिसे वोट बैंक की चिंता न हो। पर हमारे देश की परम्परा है, राजनीतिक परम्परा।
सही ग़लत नही, बस विरोध करना है और अपना वोट बैंक बढ़ाना है।
दुखद है कि किरण बेदी जी को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
ये वही किरण बेदी हैं जिन्हें दिल्ली में “क्रेन बेदी” नाम मिला था।
भारी जाम वाला चाँदनी चौक चमक गया था।
दिल्ली विश्व विद्यालय, मोरिस नगर में छेड़-छाड़ करने वाले मनचलों में दहशत पैदा हो गई थी।
ना जाने कौन सी लड़की किरण बेदी हो।
पर हर बार सही काम करने वालों को हमारे देश में घटिया राजनीति का शिकार होना पड़ता है।
अब चाहे वो खेमका जी हों या किरण बेदी।
किरण जी को इनके सराहनीय कार्यों के लिए सदैव ताबादलो का उपहार मिलता रहा।
पर ये जहाँ भी गई, ईमानदारी से कार्य करते हुए अपनी पहचान बनाई।
आज भी ये सहीं है पर अपना आदेश वापस लेने को बाध्य है।
देश की हवा ही कुछ ऐसी है।
जनता का स्वास्थ्य बिगड़े या सुधरे बस वोट बैंक बना रहे। राजनीतिज्ञो का विरोध देश का दुर्भाग्य बन गया है। हर एक काम की शुरुआत से पहले ही आ जाता है विरोध!
अब बदलाव को ना आने देने वाले बदलते भारत के लिए क्या हे कहे! शायद इतना ही, मेरा भारत महान, सौ में से नब्बे बे ईमान!
यही है हमारी शान और पहचान।

