अयोध्या राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की तीखी टिप्पणी
उच्चतम न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों से अयोध्या विवाद एक बार पुनः संज्ञान में आया है। वैसे तो हर लोकसभा चुनाव के समय ये अयोध्या विवाद एक प्रमुख मुद्दा अवश्य ही होता है जिसका निराकरण सालों से नहीं हो पा रहा है। सरकारें आ रही हैं जा रही हैं लेकिन मुद्दा वही पहले भी था आज भी है।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और संजीव खन्ना की पीठ ने पंडित अमरनाथ मिश्रा की अयोध्या में गैरविवादित अधिग्रहीत भूमि पर पूजा करने की इजाजत मांगने वाली याचिका को नाराजगी के साथ खारिज करते हुए याचिकाकर्ता से कहा ‘तुम लोग इस देश को शांति ने नहीं रहने देना चाहते। इस विवाद को भड़काने में लगे रहते हो जबकि इसमें मध्यस्थता की प्रकिया जारी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है जिसको सुप्रीम कोर्ट की भी सहमति प्रदान है और यह जुर्माना हटाने से इनकार कर दिया है।
हालांकि इस याचिका का अयोध्या विवाद के मुख्य मुकदमे से कोई संबंध नहीं है। मुख्य मामले को सुलझाने के लिए तीन सदस्यीय पीठ बनाई गयी है जो बातचीत से सुलह के प्रयास कर रही है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय के पास 14 अपीलें लंबित हैं।
अयोध्या विवाद की शुरुआत 1885 में हुआ जब यह मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की। 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिन्दुओं को पूजा की इजाजत दी। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया। जून 1989 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया। बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने सितम्बर 1990 में गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए।आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।
30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी। किंतु सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। वर्तमान में यह मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है और सुलह की प्रक्रिया जारी है।

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