DAUGHTER’S DAY या बस दिखावे का आडंबर?
आज के इस डिजिटल युग में फादर्स डे, मदर्स डे और ये DAUGHTER’S DAY, सबके लिए एक-एक दिन निर्धारित किये गये हैं. इन सारे दिनों पर हम सोशल मीडिया पर इन लोगों की फोटोज के साथ अपनी फोटोज का कोलाज़ बना कर पोस्ट करते हैं, और फिर इंतजार में लग जाते हैं लाइक्स और कमेंट्स के. हर प्रमुख दिन के मौके पर हमारे इन रिश्तों पर हमारा अतिरिक्त प्रेम निकलकर आता है. पर दरअसल ये प्रेम उन तक तो पहुच ही नहीं पाता जिनका दिन होता है. कितने ही लोग फादर्स डे और मदर्स डे पर माँ-बाप की फोटोज डालते हैं, पर उनमे से कितने ही लोगों के माँ-बाप सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं, हाल ये है कि आज की तारीख में ये बस लाइक्स और कमेंट्स पाने की एक कला बनकर सिमटता दिखाई दे रहा है.
मेरा एक सवाल है, कि जितनी ज्यादा तवज्जो आज की जनरेशन अपने माँ-बाप को दे रही है, और हम अपने देश की बेटियों के साथ जो कर रहे हैं, तो वो सब देखते हुए क्या हमे ये DAUGHTER’S DAY मानाने का हक़ भी है? मेरी बातें समझ नहीं आ रहीं तो जरा नीचे लिखी चीज़ों पर गौर कर लें.
हम रोज़ ही अखबार के पन्ने पलटते वक़्त या ऑनलाइन सर्फिंग के दौरान, एक या दो या उससे भी ज्यादा रेप की ख़बरें मौजूद पाते हैं. पर अब अगर देखा जाए तो हमें इन ख़बरों की जैसे आदत सी हो गयी है, ज़रा सा मुह बनाकर हम इन ख़बरों से नज़रे फेर लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं या फिर इनपर गौर ही नहीं करते हैं. ये सुनने और पढने में तीखा तो लग सकता है, पर दरअसल रेप की भी अब केटेगरी बन चुकीं हैं. रेप जितना ज्यादा वीभात्स्य और उसमे बर्बरता होगी, तो वो ख़बरों में टिका रहेगा और फिर ऐसे केसेस में 10 या 12 साल के बाद पीड़िता को न्याय मिलने के भी आसार रहते हैं. यहाँ नाबालिक बच्चियों से रेप होते हैं, और अगर गलती से केस सोल्व हो जाए तो उनपर सुपरहिट फ़िल्में भी बनती हैं. लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है, जो बच जाती हैं उनकी दहेज़ हत्या होती है, या फिर घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. और कुछ खुशकिस्मत होती हैं, जिनके माँ-बाप उन्हें पढ़ाते-लिखाते हैं और फ़िर कुछ बनने के बाद भी वो दफ्तर में हरासमेंट या ओछी नज़रों का शिकार होती हैं.
किस बात का दिखावा करने में लगे हैं हम, क्या बस एक दिन बेटियों के नाम कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? हम ऐसे समाज का हिस्सा हैं, जहाँ एक बाप अपनी 4 साल की बच्ची को बेहद बुरी तरह पीटकर बस इसलिए विडियो बनाता है, जिससे कि उसे छोड़कर गयी उसकी बीवी वापस आ सके. और मॉडर्न होते हमारे समाज में आज भी लड़कियों के कॉलेज में उसके कुर्ते की लम्बाई नापी जाती है, ताकि उनके पैरों का आकार ना दिखाई दे. और कितने ही उदाहरण मौजूद हैं कुंठित मानसिकता के, जो हमें रूह तक हिला देते हैं. हम या तो लड़कियों को देवी ही मान लेते हैं या सीधा दुनिया का बोझ, हम उन्हें इंसान क्यों नहीं मान सकते?
ऐसे में बस अगर समाज लड़कियों की इज्ज़त करना और उन्हें एक सामान ना मानकर एक इंसान की तरह देख सकें, तो शायद समाज से ये सारी गंदगियाँ हट सकेंगी. तब शायद एक लड़की DAUGHTER’S DAY के दिन सच में खुश हो सकेगी.


