कविता शायरी 

समय

ऐ समय! तू ही बता, तुझे दोस्त मानूँ या बला। तेरे संग में चलना ही भला, तेरे रंग में रंगना है कला। गुरु मान तुझको पूजता हूँ, समय की परीक्षा जीतता हूँ। जब काम हो ना कोई भला, तब मान लूँ तुझको बला। चल चलें कुछ कर दिखायें, उन लोगों को कुछ तो सिखायें। बेठें हैं जो यूँ ही खाली, क्यों वो अपना समय गवांयें। समय की देख महत्वता को, बाजी कोई खेल जाएं। बजा दे डंका जीत का, और वक़्त से कदम मिलायें। करलें समय को मुठ्ठी में, की…

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कविता शायरी 

ना बदल सका तू सोच को मानव

बदल रहा है तू सब कुछ मानव, ना बदल सका तू सोच को अपनी। आधुनिकता के युग में भी, तू बात करे है जाति-धर्म की।   इस विकसित होती दुनिया में, मान लूं कैसे विकसित तुझको। जहां रंग-भेद की शान है, और कला रंग बदनाम है।   इस क्षण-क्षण बढते पल में मानव, ढांचा ही बदल दिया है तूने। अफ़सोस है कि ना बदल सका तू, दहेज प्रथा का अभद्र सौदा।   बदलाव की तेरी सीढ़ी में, गांव का कोना कोना रौशन। पर रौशन हुआ ना सपना उसका, जो सोच…

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कविता शायरी 

माँ

काश तुझे ही जीता होता, छोड़ के सारी दुनिया दारी। अफसोस मुझे न इतना होता, माँ तू तो थी सबसे प्यारी।   देखा होता काश वो बचपन, जब देख मुझे तू मुस्काई थी। भूल गयी थी दर्द तू सारे, जब गोद में तेरी मैं आयी थी।   काश जानती मैं हर वो बातें, जो तुमने मुझसे छुपाईं थीं। मुझे भेजकर स्कूल अकेले, तुम भी तो घबराईं थीं।   बचपन की छोटी दुनिया में, तू तो थी संसार मेरा माँ। बड़ी हुई तो बदल गयी मैं, और बदल गया संसार मेरा…

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कविता शायरी 

ऐ मुसाफिर! बन लहर

चल शुरू कर ये डगर, ऐ मुसाफिर! बन लहर।   चलना ही जिसका काम हो, थकना ना जिसका नाम हो।   कठिनाइयों का कहर होगा, आँधियों का पहर होगा।   तू संकटों को पार करना, प्रचंड वेग को धार करना।   राहों की चट्टान तोड़ दे, ज़िन्दगी की राह मोड़ दे।   क्यूँ तू इतना सोचता है, कौन तुझको रोकता है।   रंगों से भरले, दुनिया तू अपनी। अम्बर की ओढ़, नीली सी चादर।   हासिल तुझे हर लक्ष्य होगा, व्यर्थ ना कोई कर्म होगा।   हर प्रातः तेरी जीत…

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कविता शायरी 

पर बचपना नही देखा है!!

रोज सवेरे उठकर, उसे काम पे जाते देखा है। नन्हे से कन्धों पर, उसे बोझ ले जाते देखा है।   जिंदगी की भाग–दौड़ में, उसके रोज ही गिरते देखा है। उन नन्हा से कदमों को, नंगे पाँव ही चलते देखा है।   छोटी-छोटी बातों पे, दिल खोलकर हँसना देखा है। उस प्यारी सी मुस्कान में, कुछ दर्द छुपाते देखा है।   उस छोटी सी उमर में, परिपक्वता को देखा है। भूखे पेट सोकर, उसे अपनी बदनसीबी से लड़ते देखा है।   आज ग़रीबों की नगरी में जा, ज़िन्दगी के दूसरे…

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कविता शायरी 

ऐ ज़िन्दगी! क्या खूब है तू

ऐ ज़िन्दगी ! क्या खूब है तू, खिलाड़ी मैं और खेल है तू।   खेल इतना खौफ है तेरा , अंत जिसका मौत है मेरा। अब खेल ऐसा खेलना है, हार कर भी जीतना है।   इस खेल का भी क्या दस्तूर है, ना नियम , बस फितूर है। जिसमें मंज़िल तो सबकी एक है, पर रास्ते अनेक हैं।   बहुत दूर चला गया हूँ, तेरे खेल खेलते–खेलते, की अब बस थक गया हूँ, तेरे ज़ख़्म झेलते–झेलत।   रूठ गयें हैं बहुत से अपने, छूट गयें हैं बहुत से सपने। पर ये समय है…

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