कविता शायरी 

ना बदल सका तू सोच को मानव

बदल रहा है तू सब कुछ मानव,

ना बदल सका तू सोच को अपनी।

आधुनिकता के युग में भी,

तू बात करे है जाति-धर्म की।

 

इस विकसित होती दुनिया में,

मान लूं कैसे विकसित तुझको।

जहां रंग-भेद की शान है,

और कला रंग बदनाम है।

 

इस क्षण-क्षण बढते पल में मानव,

ढांचा ही बदल दिया है तूने।

अफ़सोस है कि ना बदल सका तू,

दहेज प्रथा का अभद्र सौदा।

 

बदलाव की तेरी सीढ़ी में,

गांव का कोना कोना रौशन।

पर रौशन हुआ ना सपना उसका,

जो सोच रही थी पढ़ने का।

 

समय है मानव छोड़ ये नारा,

बदल दे अपनी विचारधारा।

फिर देख ये आलम कैसा होगा,

असल मे मानव विकसित होगा।

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2 Thoughts to “ना बदल सका तू सोच को मानव”

  1. Jivnesh tyagi

    Awesome yr ?????

  2. Umang kaler

    Nice lines

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