कविता शायरी 

मैं, मेरी हिम्मत !

अपनो से दूर,
अजनबी शहर में।
कुछ है ज़रूर,
इस नए सफर में।।

सीखा है मैंने,
खुद को ही जीना।
रुकना नही,
चलते है रहना।।

खुद का सहारा,
खुद ही है बनना।
गैरों पर भरोसा,
क्यों है करना।।

देती वजह हूँ,
हँसने की खुद को।
रोती हैं आँखें,
जब ज़ोर-ज़ोर से।।

अँधेरों से डरकर,
भागी नहीं मैं।
डग-मगाए कदम पर,
खड़ी रही मैं।।

गिरकर ज़मीन पर,
खुद को संभाला।
कुछ यूं ही मैं,
बन गई उजाला।।

लाखों की भीड़ में ना कोई तेरा,
साथी मुझे बनाना है मेरा।
हिम्मत का रखना है बसेरा,
रात हो जाये या सवेरा।।

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