कविता शायरी 

तेरी-मेरी दोस्ती

छोटा सा एक बच्चा था,
मासूम बहुत ही लगता था।
माँ का था वो राज-दुलारा,
शर्मिला सा बहुत ही प्यारा।

एक खेल खुदा ने ऐसा रचाया,
गरिमा से कैम्प में तुझे मिलाया।
हुस्न ने उसके तुझे हराया,
ना जाने कैसा जादू चलाया।

हर अदा पे उसकी तू मरता था,
पर कहने से तू डरता था।
प्यार वो तेरा पहला था,
एहसास ही कुछ अलबेला था।

प्यार बना तेरा खुंखार,
जान की बाजी लगी कई बार।
डर गई गरिमा, अब हो क्या?
टब गयी बात सरगम के पास।

फिर शुरू हुई सरगम से बात,
तुझे समझाया लाखों बार।
प्यार-व्यार सब धोखा है,
दोस्ती का यही मौका है।

बात-बात में दिन बीते फिर,
शुरू-हुआ एक नया सफर फिर।
ख़ुदा की रहमत ऐसी बरसी,
हो गयी दोस्ती हम सबकी।

रंग चेहरे के यूँ ही खिल उठते हैं,
साथ में जब हम सब रहते हैं।
लोग भी यूँ ही जल उठते है,
साथ में जब हम सब दिखते हैं।

देख के अपनी इस यारी को,
मैं तो कहूँगी- बस एक बात।
ये प्यार नही, दोस्ती है बॉस,
क्योंकि इसमें है कुछ तो खास।

कितना भी लड़लें हम यारा,
मिलना है हम को दोबारा।
ये रिश्ता ही कुछ ऐसा है,
अपना प्यार दोस्ती जैसा है।

ऐ ख़ुदा! तू मेरी बात को सुनना,
इस दोस्त की दुआ, हर कुबूल करना।
हर रास्ते हमारे बेशक अलग हों,
पर मंजिल हमेशा एक रखना।

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