कहाँ रुकेगी नंबरों की यह होड़ ?
विगत मंगलवार को CBSE बोर्ड के 10वीं कक्षा के परिणाम आए। आजकल CBSE बोर्ड के एग्जाम के जो नतीजे आ रहे हैं वो बड़े हैरान करने वाले आ रहे हैं।
इस साल जो नतीजे आए हैं उनमे करीब 1,31,493 छात्रों को 90 फिसदी से ज्यादा तो 27,476 छात्रों को 95 फिसदी से ज्यादा नंबर मिले हैं। खबर ये भी सुनने को मिली कि परिणाम आने के तुरंत बाद ही उम्मीद के अनुसार नंबर नहीं मिलने के कारण तीन छात्रों ने आत्महत्या कर ली।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर CBSE बोर्ड के एग्जाम में छात्रों को इतने नंबर मिल कैसे रहे हैं? नंबरों की इस होड़ ने पुरे एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नंबरों की यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे चिंता का विषय बनते जा रही है। नंबरों की इस होड़ से न केवल बच्चों और माता-पिता पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि जिन बच्चों के नंबर ज्यादा नहीं आएंगे या 60-70 फिसदी नंबर लाने वाले छात्र अपने भविष्य को लेकर दुविधा में आ जाएंगे।
कैसे आ रहे इतने ज्यादा मार्क्स?
जानकारों के कहना है कि अब सवाल ही काफी लिमिटेड पूछे जाने लगे हैं। इसलिए जवाब भी लिमिटेड ही होते हैं। जवाब सिमित होने से इवैल्यूएटर के लिए मार्किंग आसान हो जाती है। अगर जवाब सही है तो पूरे नंबर मिल जाते हैं और अगर गलत है तो पूरे नंबर कट जाते हैं।
पहले जो सवाल पूछे जाते थे उसका उत्तर विस्तार से देने को कहा जाता था। अब काफी शॉर्ट में सवाल पूछे जाते हैं तो उसका जवाब भी शॉर्ट में ही दे दिया जाता है। CBSE के इस सिस्टम में इमेजिनेशन और सोच-विचार के लिए जगह ही नहीं बचा है।
कॉम्पिटिटिव एनवायरनमेंट
अब आजकल आसपास माहौल भी काफी कॉम्पिटिटिव हो गया है। छात्रों को पता है कि कम नंबर आने से अच्छा भविष्य नहीं बनाया जा सकता है।इसलिए वे ज्यादा नंबर के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं।
लेकिन क्या नम्बरों के इस होड़ से बच्चों पर अतिरिक्त दबाव नहीं आएगा? जिन बच्चों के कम नंबर आएंगे वो तो फ़्रस्टेशन में जाएंगे ही साथ ही साथ अच्छे नंबर लाने भी फ़्रस्टेशन का शिकार हो सकते हैं।
क्योंकि उनसे हमेशा ही अच्छे नंबरों की उम्मीद की जाएगी और ये जरुरी तो नहीं कि बच्चे हमेशा 95% से ज्यादा नम्बर लाये ही। ऐसा सिस्टम होना चाहिए जिसमे बच्चों की प्रतिभा नंबर से नहीं, बल्कि उनकी काबिलियत से आँका जाना चाहिए।
Writer at India Alive

