कितना जायज है मुंबई के आरे कॉलोनी में पेड़ काटने का विरोध
(दिल्ली, राजेश्वर सिंह ): जब आप एक साथ सुनते हैं कि फलां जगह पर जंगल कटा जा रहा है तो आपके अंदर विरोध का स्वर पैदा होना जायज है. खास कर एक ऐसी सरकार के कार्यकाल में जिसने अपने पहले कार्यकाल आम जनता को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का काम किया होगा. और वामपंथियों का विरोध और तेज हो जाता है जब उन्हें ये मालूम चले कि उस राज्य में भाजपा की सरकार है. समाज में एक वर्ग है जो ऊपर की बात सुनकर तुरंत प्रतिक्रिया देता है, बिना इन चीज़ों पर दिमाग लगाए कि कोई काम क्यों किया जा रह है, किसके लिए किया जा रहा है, कहाँ किया जा रहा है, किसके द्वारा किया जा रहा है?
ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है मुंबई के आरे में हो रही पेड़ों कि कटाई के मामले में. वामपंथियों का धड़ा जो लगभग हर क्षेत्र में घुन की तरह घुसा हुआ है चाहे मीडिया हो या फिल्म, ऐसे मौकों पर उनके अंदर से बिना दर्द वाली चीखें बाहर निकल कर आती हैं. मुंबई के आरे कॉलोनी में मेट्रो कार शेड बनाने के लिए काटे जाने वाले पेड़ों पर भी तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों का दर्द उभर कर आ रहा है. चरस के धुंए से शैक्षणिक माहौल को गन्दा करने वाले विकास के इस काम पर भी गंध फ़ैलाने आ गए. पर वो शायद भूल गए थे कि यहां वो भोले भाले आदिवासी नहीं रहते जिन्हे बरगला कर तम उनके हाथों में कलम कि जगह हथियार थमाते आये हो.
मुंबई की आरे कॉलोनी में एक मेट्रो कार्ड शेड बनाई जा रही है. जिस क्षेत्र के लिए बार बार जंगल शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, वो वास्तव में कोई जंगल नहीं है. है वहां बड़ी मात्रा में पेड़ जरूर हैं. कोर्ट भी उस जगह को जंगल मानने से इंकार कर चुका है. तीन किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में कुल 2.47 लाख पेड़ हैं. तथाकथित पर्यावरण प्रेमियों द्वारा द्वारा कुछ ऐसे दुष्प्रचार किया जा रहा जैसे इस प्रोजेक्ट के लिए पूरे क्षेत्र के पेड़ों को उजाड़ा जा रहा है. मगर अफवाहों से दूर हट कर इस पर हकीकत में जाओगे तो पाओगे की सिर्फ 2656 पेड़ ही काटे जाने हैं. जिस क्षेत्र में ये मेट्रो बनाया जा रहा है वहां 3 किलोमीटर के दायरे में कोई बस, ऑटो, टैक्सी का साधन न होने से प्रतिदिन आने जाने वाले हजारों लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. इस मुसीबत से उबारने के लिए बीएमसी ने वहां मेट्रो बनाने का निर्णय लिया. इस मामले में आयी 13 याचिकाओं को भी कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है.
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आरे कॉलोनी के कुल 1278 हेक्टेयर के इस क्षेत्र में से महज 30 हेक्टेयर को इस मेट्रो परियोजना के लिए प्रयोग में लिया जाएगा. जिसमे से 5 प्रतिशत क्षेत्र हरियाली के लिए भी छोड़ा जाएगा. कुलमिला कर देखें तो कुल एरिया का महज 2 प्रतिशत हिस्सा मुंबई मेट्रो द्वारा प्रयोग किया जाएगा. मगर इस प्रोजेक्ट से वहां रहने वाले एक बड़े वर्ग को बड़ा लाभ होने वाला है. उसके अलावा व्यक्तिगत वाहनों के प्रयोग में कमी आएगी और लोग सार्वजानिक मेट्रो सुविधा का प्रयोग करेंगे जिससे शहर के अंदर प्रदूषण में भी कमी आएगी. सरकार कि बात माने तो 2656 पेड़ काटने के बदले 6 गुने पेड़ सरकार लगाएगी, जिनकी लगातार देखरेख सुनिश्चित की जाएगी.
बात करते हैं, इसका विरोध करने वाले गैंग पर, तो आप सब जानते हैं कि महाराष्ट्र में चुनाव होने जा रहे हैं और विपक्ष इसको मुद्दे को हवा देकर सरकार के विरोध में हवा बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, उनके पर्यावरण के नाम पर चलाये जा रहे प्रोपगंडा को हवा दे रहे हैं ऐसी के कमरों में रातें गुजरने वाले, महंगी कारों में लौंग ड्राइव पर निकलने वाले, बहुमंजिला खूबसूरत बंगलों की बालकनी में खड़े अपने प्रशसंकों को हाथ हिला कर हाय करने वाले.
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अब उन्हें उस मेट्रो से करना ही क्या है, जिसमे उन्हें चलना ही नहीं है. उसमे चलना तो आम जनता को है, हम तुम लोगों को है. सेलेब्रिटीज़ की आड़ में इस मामले को किस तरिके से प्रोपगंडा बनाया गया है, उसे इस चीज़ से समझा जा सकता है कि दिया मिर्जा और मनोज वाजपेयी इसके खिलाफ एक कॉपी पेस्ट ट्वीट करते हैं जिसमे दोनों ने एक ही चीज़ लिखी है.
उसके अलावा इस मामले में 13 हजार ओब्जेक्शन्स आये हैं जिनमे से 10 हजार सिर्फ कर्नाटक की वेबसाइट से आये हैं. यही सवाल खड़ा होता है कि इस तरह की कम्पैन कहाँ से चलायी जा रही हैं? किस उद्देश्य के साथ चलाई जा रही हैं? अगर वास्तव में ये बॉलीवुड सेलिब्रिटीज पर्यावरण के प्रति इतने संवेदनशील हैं तो उस समय उनकी संवेदनशीलता और उनका पर्यावरण प्रेम कहाँ गायब हो गया था जब मुंबई के गोरेगांव में हजारों पेड़ काट कर फिल्म सिटी का निर्माण किया गया. क्या सिर्फ इस लिए पेड़ काट कर फिल्मसिटी बनाये जाने का विरोध नहीं किया गया क्योंकि वो तुम्हारे धंधे से जुड़ा था. फिर भी अगर आप बॉलीवुड के चंद लोगों द्वारा इसका विरोध करने की बात कह रहे हैं तो उन का भी नाम बताओ जो उसका समर्थन कर रहे हैं. अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार क्या दुसरे ग्रह से आये हैं?
खैर आप विरोध करिये आरे कॉलोनी में पेड़ काटने का, क्योंकि फिलहाल आप यही कर सकते हैं. इससे ज्यादा आपके बस में है नहीं. सब दुनिया आपकी हकीकत जान चुकी है कि आपका विरोध चुनिंदा है. अपना विकास कर लिया कम से कम बाकी लोगों का तो हो जाने द्जिये. सरकार चाहती थी इस प्रोजेक्ट को रोक सकती थी, मगर उसे पता है कि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जो अपना विकास न चाहता हो. बहरहाल, पेड़ कट गए और आज शाम ट्रकों में भरकर अपने गतंव्य को रवाना हो जाएंगे. बस इतनी नजर रखना कि कोई नेता कटे हुए पेड़ों को अपने घर न ले जाए. बाकी बिना उद्देश्य के अपने झूठे विरोधों को दर्ज करवाते रहिये, अपनी मौकापरस्ती साबित करते रहिये.
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. इनका हमारी वेबसाइट से कोई सम्बन्ध नहीं है.)

Political Analyst and Commentator, Interested in Political Strategy, Election Campaigns and E-Governance Implementation.

