जनसंख्या नियंत्रण में भी धर्म की राजनीति
प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जनसंख्या नियंत्रण को देश हित के लिए जरूरी बताया। प्रधानमंत्री के इस विचार को विपक्षी पार्टियों ने बेबुनियाद बताते हुए जनसंख्या विस्फोट की रोकथाम को भी धर्म के तराजू पर तौलना शुरू कर दिया है।
जनसंख्या नियंत्रण के विरोध में खड़े विपक्षी
AIMIM के नेता असेदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री की सलाह को अनुपयोगी बताया। ओवैसी ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण करने का मतलब है लोगों के निजी जिंदगी में दखल करना। ओवैसी ने कहा कि ऐसा करने से हिंदुस्तान बुजुर्गों का देश बन जाएगा। ओवैसी का कहना है कि प्रधानमंत्री को यह भी नहीं पता कि युवा आबादी का कैसे इस्तेमाल किया जाए।

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वहीं कांग्रेस पार्टी के नेता राशिद अल्वी ने कहा कि तमाम विपक्षी नेताओं के साथ बैठकर इसके लिए कोई रास्ता निकालना चाहिए। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेता तो कहते हैं कि 10 – 10 बच्चे पैदा करो। पहले उनकी जुबान बंद कीजिए। केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि यह तो राष्ट्रीय हित का मुद्दा है जो लोग इसको किसी भी रूप में सांप्रदायिक मुद्दे के रूप में देखते हैं तो उनके मानसिक रूप से दिवालिया पन के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारत वर्तमान समय में लगभग 137 करोड़ से ज्यादा आबादी
भारत वर्तमान समय में लगभग 137 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला देश बन चुका है। यदि ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो क्या एक परिवार के सभी बच्चे को उनकी बराबरी का हक मिल पाएगा? क्या देश भुखमरी और गरीबी से मुक्त हो पाएगा? क्या बेरोजगारी की समस्या और नहीं बढ़ जाएगी? ऐसे ना जाने कितनी समस्या देश में पनपती जाएंगी। भोजन तो सिर्फ दो लोगों का होगा लेकिन उसे खाने वाले 10 होंगे।
ऐसे लगातार बढ़ती जनसंख्या के बाद वह दिन दूर नहीं जब हमें सीमित संसाधन में काम चलाने की जरूरत पड़ेगी। ऐसे जनसंख्या नियंत्रण को धर्म से से जोड़ना, निजी जीवन से जोड़ना निहायत ही बेवकूफी भरी बात नजर आती है।
कोई धर्म या नहीं कहता कि जरूरत से ज्यादा बच्चे तो पैदा कर लो लेकिन उनकी परवरिश ना कर पाओ। भले ही उन्हें सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ दो। उन्हें उनके हिस्से की शिक्षा मुहैया न करा पाओ। ऐसा कोई धर्म और समझदार व्यक्ति नहीं कह सकता। जरूरत है स्वयं इच्छा से जनसंख्या नियंत्रण पर योगदान देने की।

