11 सितम्बर विवेकानंद जी के शिकागो वक्तव्य पर पीएम मोदी के ‘सपनो का भारत ‘सम्बोधन का डीएनए टेस्ट
11सितम्बर का दिन भारत के इतिहास मे स्वर्णिम दिनों मे से एक है जिस दिन स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो सम्मेलन मे हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व करते हुए हिन्दुस्तान के बौद्धिक बल व आत्मीय बल का लोहा मनबाया और अपने एक वक्तव्य से दुनिया को अपना बना लिया ।
लेकिन अफसोस कि 11सितम्बर का ये विशेष दिन उस महान आत्मा विवेका नंद की उपलब्धि पर गर्व महसूस करने तक ही सीमित रह गया क्योकि हमने उनके विचारो को पुस्तको मे स्थान तो दिया पर दिल मे स्थान देने मे हम असफल रहे और यही कारण रहा कि भारत भूमि पर फिर किसी विवेकानंद का जन्म नही हुआ और विवेकानंद के सपनो का भारत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से पिछड़ता चला गया।
कल देश के प्रधान सेवक मोदी जी ने भी इन्ही सब बातो को ध्यान मे रखते हुए अपना वक्तव्य आरम्भ किया और देश की युवा शक्ति से अपने भारतीय संस्कारो और संस्कृति का हवाला देते हुए अनेकता मे एकता के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत बनाने का आग्रह भी किया ।
देश के प्रधान सेवक मोदी जी ने स्वच्छ भारत पर चर्चा करते हुए भी उन गेर जिम्मेदार नागरिको पर तीखी टिप्पणी की और कहा अगर आप पान खाकर अपनी मातृ भूमि पर मुँह से पीक कर रहे है तो आपको वंदे मातरम् कहने का भी अधिकार नही है ।
शायद उनका ये कथन कई देश वासियो के दिल मे कांटे की तरह भी चुभा होगा लेकिन आज ये चिंतन का विषय भी है क्योकि कोई भी बड़ा सुधार व्यक्ति विशेष के विचारो या व्यक्ति विशेष के प्रयासों से सफल होना नमुमकिन ही प्रतीत होता है और बैसे भी राष्ट्र न तो किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति है और न ही व्यक्ति विशेष का दायित्व …राष्ट्र एक सामूहिक जिम्मेदारी है जिसके विकास की परिकल्पना को सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही साकार बनाया जा सकता है ।
तो आइये हम और आप अपने देश के प्रधान सेवक के शब्दों पर चिंतन करे और इस देश व मातृ भूमि को विकासशील और स्वच्छ बनाने के लिए संकल्पित होकर कार्य करे ।



