आख़िर डायरेक्टर पर चयन समिति से मंजूरी क्यों नहीं ली ।
सीबीआई में अफसरों के विवाद मुद्दों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से तल्ख तेवर में सवाल पूछे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि सीबीआई बनाम सीबीआई मामला दो उच्च अफसरों के बीच की ऐसी लड़ाई नहीं थी । जो की तुरंत रातभर में ही सामने आ गई । सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि ऐसे मुद्दे नहीं थे कि केंद्र सरकार को चयन समिति से विचार-विमर्श किए बिना सीबीआई डायरेक्टर की शक्तियों को तुरंत खत्म करने का फैसला करना पड़े । सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस नतीजे के खिलाफ आलोक वर्मा और एनजीओ कामन काज की अपील पर सुनवाई पूरी करते हुए । इस मामले पर फैसले को सुरक्षित कर लिया है । सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि आख़िर डायरेक्टर पर चयन समिति से मंजूरी क्यों नहीं ली ।
आख़िर डायरेक्टर पर चयन समिति से मंजूरी क्यों नहीं ली ।
इसके पहले चयन समिति से मंजूरी के विषय पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की समिति वाली बेंच ने कहा है कि केंद्र सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि ऐसी परिस्थिति पिछले 3 महीनों में पैदा हुई है । बेंच ने यह भी कहा है कि अगर केंद्र सरकार ने सीबीआई डायरेक्टर की शक्तियों पर रोक लगाने से पहले चयन समिति से विचार-विमर्श करके मंजूरी ले ली होती तो कानून का बेहतर पालन हुआ होता । सुप्रीम कोर्ट ने कहां है कि सरकार की कार्रवाई की भावना हमेशा संस्थान के हित में सोच करना चाहिए ।
सीबीआई मामलों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के सख्त तेवर नजर आए । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह पूछा कि सरकार ने 23 अक्टूबर को सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा की शक्तियों को वापस लेने का फैसला तुरंत एक ही रात में क्यों ले लिया ? चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि जब आलोक वर्मा कुछ महीनों में रिटायर होने ही वाले थे । तो कुछ और महीनों का इंतजार और चयन समिति से केंद्र सरकार ने विचार-विमर्श क्यों नहीं किया ? तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को इस सवाल का जवाब बताया कि केंद्रीय सतर्कता आयोग ( सीवीसी ) इस फैसले पर पहुंचा था कि असाधारण परिस्थितियां पैदा हो गई है । उन्होंने कहा कि असाधारण परिस्थितियों को कभी-कभी और साधारण उपचार के द्वारा खत्म करना होता है ।
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