बेरोजगारी का आलम क्या है ?
बेरोजगारी का आलम : बेरोजगारी ऐसा मुद्दा है जिसे हमने यूपीए सरकार वन, टू और मोदी सरकार वन और टू दोनों समय पर प्रमुख मुद्दों में एक माना है। बात तथ्य के साथ शुरू की जाए तो मनमोहन सिंह सरकार के दौर में 5% पार कर चुकी बेरोजगारी दर आज यदि 8% है तो स्थिति तो बद से बदतर हो चुकी होती लेकिन सड़कों पर कोई धरना प्रदर्शन, कोई आंदोलन देखने को नहीं मिलता। टीवी पर बैठकर सरकारी सीमित नौकरियों पर चिल्लाने वाले मायूस एंकर भी एक फोटो या वीडियो ऐसे आंदोलन की नहीं ला पाए फिर रोंधवन्दन का एक सूत्री कार्यक्रम ज़ारी है।
बेशक कुछ सेक्टर्स में नौकरियां गई है बेरोजगारी बढ़ी है लेकिन क्या इस तथ्य से मुंह मोड़ा जा सकता है कि हर समय नौकरियों का सृजन नहीं किया जा सकता। दूसरी बात जो बेरोजगारी का आलम समझने में है वह यह है कि हम किसी व्यक्ति की अक्षमता को भी आधार मानेंगे कि वह क्यों कोई जॉब नहीं पाया या फिर हम केवल सीमित सरकारी नौकरियों की भर्तियों तक ही रह जाएंगे, क्या किसी देश की जनसँख्या में 100 प्रतिशत में रोजगार हो सकता है ?
बेरोजगारी का आलम : आखिर कब बदलेगा पैमाना ?

आखिर बेरोजगारी का आलम क्या है ? इसे कैसे समझा जाए कोई जॉब सृजित क्यों नहीं हो पा रहा है। एक जॉब आवेदक अपनी ही काबिलियत या गलत जॉब चुनने के द्वारा जो कि उसके कौशल से मेल नहीं खाती क्या उसे बेरोज़गारी कहेंगे? या फिर सीमित सरकारी भर्तियां, सिमित संसाधन लेकिन आबादी , कम सीटें ज्यादा एप्लीकेंट्स जैसे कारक भी जोड़े जायेंगे।
आखिर बेरोजगारी परिभाषित कैसे होगी? एक इसकी शुरुआत आखिरकार किसी ने तो की है। मोदी सरकार ने बेरोज़गारी का डाटा नहीं छुपाया गया बल्कि उसने बेरोजगारी गणित करने का जो तरीका है उसे दुरुस्त किया है। उसमें छोटे-छोटे जॉब्स को भी जोड़ा गया है जिसमें रेडी वाली से लेकर डिलीवरी ब्वॉय तक भी शामिल है। पहले बेरोजगारी केवल सरकारी दफ्तर में बैठकर या किसी प्राइवेट सेक्टर ऑफिस में जॉब तक ही सीमित थी। जो यह जॉब्स पाता था वह बेरोज़गार नहीं रहता था। जिसका नहीं हो पाता था वह बेरोजगार था ! सड़क पर अपनी जॉब छोड़ अन्य बड़ी जॉब की तलाश में भटक रहा आदमी भी इसी श्रेणी में आ जाता था जबकि उसके लिए तो जॉब है।
जब कोई काम बड़ा छोटा नहीं होता तो बेरोज़गारी को तय करने में छोटा- बड़ा का भेद आखिर क्यों ? सब को शामिल किया जाए ताकि बेरोज़गारी के विषय पर दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। घर में फालतू बैठा शख्स ही बेरोज़गार है या फिर सच्च में दिन-रात जॉब की तलाश में हड़ने वाला वह व्यक्ति जिसे सच में जॉब की तलाश है। बेरोज़गारी का आलम संकीर्ण नहीं हो सकता क्योंकि यह विस्तृत है।
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Web Journalist
Ex- Punjab Kesari, Bihar Express, Unacademy

