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कभी खुद से मिल लिया करो कभी-कभार

कभी खुद से मिल लिया करो क्योंकि अच्छा लगता है पता है क्यों अच्छा लगता है ? अच्छा इस बात पर लगता है कि हम खुद के लिए समय ही नहीं निकालते हैं , यदि निकालते भी हैं तो दूसरों के लिए खुद के लिए कभी समय मिल भी गया तो वह जरूरत से कम हो जाता है| समय जरूरत से कम हो जाता है तो हम बचे हुए समय में से खुद के लिए समय निकालना भूल जाते हैंI याद आ भी जाए तो हम फिर किसी दूसरे काम में फँस जाते हैं लेकिन खुद के लिए समय निकालना ही पड़ेगा क्योंकि लोग आए या लोग जाएं , परछाई बनके हो या हम “आप” बन जाए हमें खुद के साथ ही रहना है|

इस मामले में खूब कहा था हिटलर मियां ने कि “अंधेरे में तो परछाई भी साथ छोड़ देती है” तो आप दूसरों से उम्मीद कर के बैठे हो एक हसीन धोखा खाने के लिएI जब एक सच्चे आशिक की प्रेमिका उसे छोड़ जाती है यह बोलकर कि पापा नहीं मानेंगे , कि पापा सब जान चुके हैं सच्चा आशिक उसे यकीन दिलाता है कि पापा मान जाएंगे पर उस मासूम और अँधे चेहरे को क्या पता उसका घर , उसका सपना , उसकी होने वाली बीवी …..यह हसीन वास्तविक सपना सब टूट चुका है सच होने से पहले ही क्योंकि वह खुद को समय नहीं दे पा रहा था उसने सारा समय दूसरों को दे दिया था|

खुद से मिल लिया करो…….इस बात को याद रखते हुए 

 

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जरा खुद को भूल सा गया था वह वह हसीन से ख्वाब जो उससे दूर हो गया थाI अकेलेपन ने उसे यथार्थ से मिला दिया , यथार्थ से मिलने के बाद उसने खुद को पा लिया खुद को पहले जो खो चुका थाी|

वह “खुद” से थोड़ा रूठा था पर “वह” मान गए और दोनों ने “खुद” को गले लगा लिया| अब वह खुद के साथ समय बिताता है, जरूरत के मुताबिकI सर्वदा कभी भी खुद को भूल जाओ तो खुद ही खुद को याद कर लेना क्योंकि हम ही खुद हैं और कुछ नहीं ! खुद ही खुश रहो समझो खुदा ने खुद तुमको खुश किया है| खुशकिस्मत है वो जो खुद के साथ समय बिताते हैं आखिर खुद को पा लिया जहां पा लिया खुद्दार बनो खुद के साथ कभी अकेला नहीं लगता है|

 

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