विजयादशमी विशेष-क्या है रावण के बारे में फैलाये जा रहे आधुनिक झूठों का सच, पढ़ें यह लेख
Delhi, Rajeshwar Singh. मॉडर्न कलियुग में विधर्मियों ने महज भगवान श्रीराम का विरोध करने के लिए रावण में खूबियां ढूढ़ने काम शुरू कर दिया है इसके लिए तरह-तरह के कुतर्क दिए जाने शुरू हो गए हैं. रावण के खूबियों के नाम पर भ्रांतियां फैलाने का काम किया जा रहा है. ऐसे में विजयादशमी के अवसर पर ऐसे रावण और रावण जैसी सोच रखने वाले झूठ के पुलिंदों की पोल खोलना जरूरी हो जाता है. रावण कितना अच्छा, कितना सच्चा, कितना ईमानदार, कितना नैतिक था, उसकी प्रसंशा में कसीदे पढ़ने वालों को इसके बारे में बताना जरूरी हो जाता है.
उसके बारे में झूठ फैलाया जाता है कि रावण बहुत ईमानदार था.मगर सच ढूढेंगे तो पता चलेगा कि जिस सोने की लंका में रहने के पर रावण इतना घमंड करता था वो उसने छल से प्राप्त की थी. भगवान शिव ने पार्वती के लिए सोने की लंका बनवायी थी, जिसमें गृह प्रवेश के धार्मिक क्रिया कलाप के लिए रावण को बुलाया गया था. तभी दक्षिणा के रूप में रावण ने लंका मांग कर उसे छल से हड़प लिया. इस कृत्य से रावण प्रेमियों के लिए रावण की ईमानदारी साबित हो जाती है.
बहुत से लोग ये कह कर रावण की प्रशंसा करते हैं कि रावण ने इसलिए सीता का अपहरण किया क्योंकि लक्ष्मण ने उसकी बहन सूपर्णखां के नाक कान काट दिए. अब उन्हें कौन बताये कि नियत के खराब रावण को उसकी बहन ने अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए यह कहते हुए भढ़काया कि राम की पत्नी सीता बहुत सुन्दर है और वो तुम्हारी पत्नी बन सकती है. बस रावण बहक गया और सीता जी का अपहरण करके अपनी बहादुरी दिखा दी. वो भी छल से, मृग मारीच के सहारे. अगर अपनी बहन का बदला लेने गया तो उसने साधू का वेश क्यों धारण किया, राम से युद्ध क्यों नहीं किया?
आज कल अफवाह फैलाई जाती है कि रावण इतना नैतिक था कि उसने 2 साल तक सीता को अपनी अशोक वाटिका में रखा मगर हाथ नहीं लगाया. अब उन मॉडर्न ज्ञानियों को कौन बताये कि 2 साल तक सीता से हाथ न लगाना रावण की नैतिकता नहीं बल्कि उस अधर्मी कि मज़बूरी थी. दरअसल एक बार स्वर्ग की अप्सरा रम्भा रावण के भाई कुबेर के पुत्र नल कुबेर से मिलने का जा रही थी. सुंदर होने के कारण रावण का उसकी ओर आकर्षित हो गया. काफी मिन्नतें करने के बाद भी रावण ने रम्भा के साथ जबरस्दस्ती दुराचार कर दिया. जिसके बाद नलकुबेर ने रावण को श्राप दिया कि वह कभी किसी स्त्री से बिना उसकी मर्ज़ी के हाथ नहीं लगा सकेगा.
प्रोपगंडा यूनिवर्सिटी के लोगों द्वारा आज कल सोशल मीडिया पर ये भी फैलाया जाता है कि रावण के हृदय में सीता जी के लिए कोई कुविचार नहीं था, मगर हकीकत में जाओगे तो पाओगे कि रावण लगातार सीता जी को अपनी बातों से बहलाने का प्रयत्न करता रहा, कई तरह के लालच दिए, आखिर में गुस्से में उसने सीता जी को दो महीने की मोहलत भी दी कि अगर दो महीने के अंदर वो रावण से विवाह के लिए तैयार न हुई तो उनको जान से मार देगा. मगर उसके बाद भी सीता जी तैयार न हुईं तो रावण उन्हें मारने के लिए दौड़ा मगर उसकी दासियों ने उसे उसके श्राप के बारे में याद दिला दिया तो डर से रुक गया.
जब रावण सीता जी को लेकर पुष्पक विमान से जा रहा था तो जटायु ने उसे रोकने की कोशिश की. मगर रावण ने उस निरीह पक्षी पर अपनी तलवार से हमला कर उसकी हत्या कर दी. ये भी एक प्रमाण है कि वो किस प्रवत्ति का ब्राह्मण था. रावण ने अपने भाई कुबेर से अपनी शक्ति के दम पर पुष्पक विमान जबरदस्ती छीन लिया, तब भी रावण आज के कुछ कलयुगियों की नजर में महान पंडित है.
जो लोग जो कहते हैं कि रावण बहुत बड़ा शिवभक्त था,उनको ये बात भी जान लेनी चाहिए कि वो शिवभक्त स्वेच्छा से नहीं बल्कि मज़बूरी में बना. जब एक बार भगवान शिव पर्वत पर ध्यान लगा रहे थे तो रावण उनके ऊपर से अपना विमान लेकर जा रहा था. नंदी ने वहां से विमान ले जाने के लिए मना किया तो अभिमान में चूर रावण क्रोधित हो गया और उसने नंदी का बहुत अपमान किया. उसके बाद उसने अपने बल का दुरूपयोग करते हुए उस पर्वत को उठाने की कोशिश की जिस पर भगवान शिव ध्यान लगा रहे थे. मगर भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से उस पर्वत को दबा दिया और रावण का हाथ उसके नीचे दब गया. रावण ने भगवान शिव से दया की भीख मांगी तब शिव ने उसे मुक्त किया. तभी से वह भगवान शिव का भक्त बन गया.
सबसे बड़ी बात, जब रावण इतना धार्मिक था तो उसने हनुमान जी की पूंछ में आग क्यों लगाई. जबकि आज के समय में भी किसी पशु को आग से जलाना महापाप माना जाता है .आजकल भी बहुत से पापी लोग गाय- बैल को आग से जला देते हैं. उस समय में सो कॉल्ड धार्मिक रावण ने वो महापाप किया था. जब उसका भाई भिवीषण पापी रावण को समझाता है कि आप लड़ाई मोल न लें और श्रीराम को उनकी पत्नी वापस कर दें तो रावण ने भरे दरबार में अभद्र भाषा प्रयोग करते हुए भिवीषण को धक्के मारकर लंका से बाहर निकल दिया. क्या यही उसक धार्मिकता थी?
इन चंद बातों पर गौर करें तो उन सामान्य लोगों को भी पता चल जाएगा कि सीता जी का छल से अपहरण करना रावण के जीवन का सिर्फ एक कृत्य नहीं था.जिसके लिए भगवान श्रीराम ने उसका अंत किया. बाकी रही ज्ञान की बात तो जैसा आज के समय में कहा जाता है कि आचरण बिना ज्ञान , जैसे पिलर के बिना मकान. ये बात रावण के समय भी प्रासंगिक थी.
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Political Analyst and Commentator, Interested in Political Strategy, Election Campaigns and E-Governance Implementation.

