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मंज़िल दूर है, और रास्ता थोड़ा कच्चा, मगर पहुचना नामुमकिन नहीं

क्या किसी शख्स का किसी से मुहब्बत करना गुनाह है. नहीं, मेरी नज़रों में तो नहीं. और अब कानून की नज़रों में भी नहीं है. दरअसल पिछले साल सितम्बर में ही सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 377 के तहत समलैंगिकता को गैर अपराधिक माना था. इसका मतलब अगर कोई एक जेंडर का व्यक्ति अपने ही जेंडर के व्यक्ति से प्यार करता है या सहमति से सम्बन्ध बनता है तो संविधान की नज़रों में ये कोई गुनाह नहीं है.

कहने को तो हम अपनी सोच से लिबरल बनते जा रहे हैं. वेस्टर्न कपड़े और टॉयलेट इस्तेमाल कर हम खुद को मॉडर्न बताते नहीं थकते. पर क्या सच में हम इस तरह से खुद को वेस्टर्न व्रैप में लपेट कर अपनी सोच को मॉडर्न बना पा रहें हैं. शायद नहीं. क्योंकि हम जिस देश में रह रहे हैं वहां आज भी ऑनर किलिंग जैसी घटनाएँ होती हैं. अगर घरवालों को उनके बच्चों का अपनी मर्ज़ी से शादी करना पसंद नहीं आता, तो वो सीधे उनके क़त्ल पर ही उतारू हो जाते हैं. और तो और अब अगर कोई समलैंगिक होने की बात भी अपने माँ-बाप को बताने जायेगा तो उसे ये डर रहेगा, की कही उसके घरवाले ही समाज के डर से सुसाइड ना कर लें. क्योंकि अभी 2-3 दिनों पहले ही एक मामला ख़बर में था. जिसमे एक लड़की के खुद को लेस्बियन स्वीकारने के बाद उसके पिता ने खुद की गोली मार कर हत्या कर ली.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी समलैंगिक होना समाज की नज़रों में एक अजीब सा अपराध है. समाज अपनी कुपोषित सोच के कारण इसे स्वीकारना नहीं चाहता. आज भी किसी भी समलैंगिक जोड़े को लोगों की सवालों भरी नज़रों का सामना करना पड़ता है. और हमारे समाज के आम नागरिकों की सोच इस तरह दूषित हो चुकी है, कि उनको रेप पोर्न अप्राकृतिक नहीं लगता, मगर समलैंगिक होना प्रकृति के नियमों के खिलाफ लगता है.

अगर आप समलैंगिक और हमारे देश में रह रहे हैं, तो सच मानिए मंज़िल अभी बहुत दूर है. ये बात किसी को हताश करने के लिए नहीं बल्कि सच्चाई से रूबरू करने के लिए लिख रही हूँ. आपने तो खुद को तो पहचान लिया है, मगर समाज में खुद को स्वीकृत देखने में थोडा वक़्त लगेगा.

पर नहीं इस जंग में आप अकेले भी तो नहीं हैं. भारत में ऐसे कई एन.जी.ओ. हैं, जो LGBTQ के अधिकारों के संरक्षण में समुदाय की मदद के लिए काम करते हैं. इनमे ‘हमसफ़र ट्रस्ट’, ‘QUEERALA’, ‘SANGAMA’ (HUMAN RIGHTS GROUP), और ‘GOOD AS YOU’ जैसी संस्थाएं शामिल हैं. ये संस्थाएं देश में अलग-अलग जगहों पर कार्यरत हैं. किसी समलैंगिक व्यक्ति का, इस समाज का हिस्सा बनकर मंज़िल तक पहुचना मुश्किल तो है मगर नामुमकिन नहीं.

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