हनुमान जी की जाति के जरिए 2019 की राजनीति !!
देश में चुनाव आने वाले हैं, जनादेश से तय होगा कि किसको सत्ता सौंपी जाएगी और किसके सर सजेगा प्रधानमंत्री का ताज। वोट से तय होगा कि किसकी होगी सत्ता में ताजपोशी, पर जातिवाद भारतीय लोकतंत्र के सुनहरे दामन पर एक बदनुमा दाग है। जातिवाद को समझने के लिए उत्तर प्रदेश से बेहतर कोई राजनैतिक जमीन नहीं हो सकती जहाँ जनता और राजनैतिक पार्टियाँ दोनों ही जाति को एक महत्वपूर्ण फैक्टर मानती हैं और जातीय समीकरणों के हिसाब से ही चुनाव जीते जाते हैं। पहले इसका रूप और दायरे सिर्फ कैंडीडेट और वोटर तक ही सीमित थे पर 2019 के चुनाव से पहले अचानक हनुमान जी की जाति जानने में राजनेताओं की दिलचस्पी बढी है। क्या हनुमान जी की जाति के जरिए 2019 की राजनीति साधने की कोशिश है!!
हनुमान जी की जाति को लेकर जानिए अब तक इस मामले में किसने क्या कहा??
हनुमान जी की जाति जानने में भाजपा नेताओं की खास दिलचस्पी दिखती हैं आइए सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं किसने क्या कहा?
1.) इसकी शुरूआत होती है यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान 27 नंवबर को हनुमान जी को कथित रूप से दलित बताने को लेकर। हाँलाकि बाद में योगी आदित्यनाथ ने सफाई दी कि उन्होनें ऐसा कुछ नहीं कहा। उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, पर तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी।
2.) ये मामला जब तक ठंडा पड़ता उत्तर प्रदेश के ही मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण ने कहा है कि हुनमान जी जाट थे।
3.) इसी फेहरिस्त में ही बीजेपी से विधान परिषद् के सदस्य बुक्कल नवाब ने कह दिया है कि हनुमान मुसलमान थे। ऐसा लगता है हनुमान जी की जाति की स्थिति रजिया के गुंडो में फँसने के समान हो गयी है। तो कुलजमा हनुमान जी की जाति को लेकर बहुत से क्लेम है और उनके जरिए 2019 की राजनीति साधने की कोशिश हैं।
हनुमान जी की जाति को लेकर सोशल मीडिया पर क्या है हाल :-
जैसे ही इस तरह के बयान आए सोशल मीडिया पर लोग हमेशा की तरह मौज लेने लगे। कई लोगों ने इसे धर्म की राजनीति बताया तो कई लोगों ने जबान फिसलने का तर्क लेकर इसे डिफेंड किया, कई लोग ने इसे मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास करार दिया, बहुत से लोगों ने इसकी मुखर आलोचना भी की कि हनुमान जी की जाति जानना 21वीं सदी में महत्वपूर्ण नहीं है, यह 2019 की चुनावी राजनीति का सोचा-समझा हिस्सा है।
निष्कर्ष:-
2019 की चुनावी बिसात बिछ चुकी है, जिसमें अब एक बरस से भी कम का समय बचा है। इसलिए राजनीति का सुलग उठना लाजमी है, पर इसी चौसर में जब भगवान हनुमान की जाति ही एक पासा बन जाए तो विपक्ष भी इसमें कम दोषी नहीं है। सड़क, पानी, अस्पताल, शिक्षा जैसे विकास के मुद्दों पर बात करने के बजाय यह विपक्ष भी हनुमान जी की जाति के पैंतरे में ही उलझा है, अगर यह चीज 2019 की राजनीति का मुख्य हथियार बनती जा रही है तो कहीं न कहीं यह लोकतंत्र के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति हैं, चूँकि हमने अपनी माँ की कोख नहीं चुनी तो उस पर गर्व या शर्मिन्दगी क्यों?
हम किस जाति, धर्म, लिंग या कुल में पैदा हुए यह हमारा अपना चुनाव नहीं था, यह प्रकृति की स्वनिर्धारित व्यवस्था थी तो फिर इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों बनाया जा रहा है!! ऊपर से देवी-देवताओं की जाति खोजना कहीं न कहीं धर्म और देश को बाँटने की एक कोशिश ही कही जाएगी।
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