खेती की दुर्दशा, बढ़ती जनसंख्या और भारत का भविष्य
भारत की पहचान हमेशा एक कृषि प्रधान देश के रूप में होती आयी है लेकिन आज के भारत में कृषि की ही हालत सबसे ज्यादा नाजुक है । आज भारत की कृषि और उससे जुड़े लोगों का हाल किसी अस्पताल में पड़े उस रोगी सा हो गया है जो अपने ठीक होने का इंतजार पिछले 70- 72 साल से कर रहा है और वो आज तक इसी उम्मीद पर जिंदा है कि उसको भी इस जीवन में किसी दिन जीवन का एहसास होगा।
भारत जब आजाद हुआ उस वक़्त देश की जनसंख्या लगभग 36 करोड़ थी । आजाद भारत उस समय व्यवस्थाओं और उचित सुविधाओं के अभाव में भूख , बेरोजगारी , आर्थिक कमज़ोरियों से गुज़र रहा था । कुशल नीतियों , नेतृत्व और हरित क्रांति के मिले-जुले योग से भारत चल निकला अपने देशवासियों को स्वावलंबी बनाने , भूखों का पेट भरने और अपने अन्नदाताओं और सभी नागरिकों को एक सम्मान का जीवन देने।
पर रास्ते को तय करते-करते जब भारत 21 वीं शताब्दी के इस मोड़ पर खड़ा है तब उसको पूर्ण रूप से ये एहसास होता है उसका अन्नदाता किसान ही सबसे ज्यादा पीड़ित है । भारत चाहता है की उसका अन्नदाता खुद का पेट ठीक से भरकर दूसरे देशवासियों का भी पेट भरने लायक बने।
भारत चाहता है कि ये लाचारी की बेड़ियाँ जो अन्नदाता के पैरों में पड़ीं हैं उनसे आजाद कर दिया जाय । पर रुकिए ! ये बेड़ियाँ क्या है ? ये बेड़ियाँ हैं – गरीबी की , कर्ज़े की – बेमौसम बारिश , सूखा , बाढ़ , खराब मौसम , खराब बीज , बहतर खाद्य की कमी । – महंगी बिजली लागत , महंगा डीजल , महंगे उपकरण – न्यूनतम समर्थन रुपए का कम होना – सरकारों की कुछ अलाभकारी और अव्यव्यस्थित नीतियां जैसे ( भण्डारण ग्रह की कमी , खराब यातायात के साधन और जर्जर सड़कें ) – विभागी तालमेल का न होने की ऐसे तमाम कारण हैं जो अन्नदाता का बोझ बढ़ाते जा रहे हैं।
ऐसा नहीं है की आजादी के बाद भारत ने तरक्की नहीं की , आजादी के बाद खाद्यान्न उत्पादन भारत में निरंतर बढ़ा है – 1950- 1951 – 50.8 मि. टन 1960-61 – 82 मि. टन 1970-71 – 108.4 मि. टन 1980-81 – 129.6 मि. टन 1990-91 – 176.4 मि. टन 2000-01 – 196 मि. टन 2011-12 – 259.29 मि. टन वहीं इसकर उलट जी. डी. पी . में हम पाते है कि भारत का हिस्सा निरंतर घटता गया है, आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि कृषि की हिस्सेदारी : वर्ष 1950-51 – 59.2% 1982-83 – 36.4% 1990-91 – 34.9% 2001-02 – 25% 2006-07 – 18.5% 1947 में हमारा अनाज का उत्पादन जहां 55 मिलियन टन था वही 2017 तक ये 275 मिलियन टन तक पहुंच गया।
बेशक भारत का खाद्य उत्पादन बढ़ा पर कितना बढ़ा ? लगभग 5 गुना , पर साथ ही साथ आंकड़ों से ये भी साफ जाहिर होता है कि कैसे कृषि का योगदान गिरता गया, ये स्थिति भारत के सामने एक दिन में नहीं आई, थोड़ा और समझने का प्रयास करते हैं तो हम पाते है कि जैसे जैसे बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती जरूरतें भारत के सामने आ रहीं है हमारे सामने अलग अलग समस्याएं भी आ रही हैं जैसे , उपजाऊ भूमि का कम होना , पानी का कम होना , संसाधनों का कम होना और सबसे बड़ी बात इतने विशाल देश का पेट भरने के लिए जो तरिके हम आज अपना रहे हैं वो बेशक हमें आज जरूरत से ज्यादा भोजन उत्पन्न करने में मदद कर रहे हों पर वो ही तरिके हमारे लिए भविष्य में जहर का काम करने वाले हैं , जैसे खेती में अत्यधिक मात्रा में रसायनिक पदार्थों का उपयोग होना , अत्यधिक मात्रा में रसायनिक खाद्य का उपयोग होना।
1961 में रासायनिक खादों का उपयोग 3.38 लाख टन था , वहीं 2016 में हमने इस मीठे जहर की मात्रा को अपने भोजन में 267.52 लाख टन कर लिया । आजादी के बाद इस जहर का उपयोग हमने 80 गुना बढ़ा लिया । हमने देखा कि हमने अपना उत्पादन तो 5 गुना लगभग बढ़ा लिया पर इस जहर का उपयोग भी कितना ज्यादा बढ़ा लिया वो भी याद रखना चाहिए , भविष्य में इसका उपयोग बढेगा ही क्योंकि भारत को अपनी निरंतर बढ़ती आबादी का पेट जो भरना है । यही कारण रहा कि 2010 के दौरान यूरोप ने हमसे फल , सब्जी मंगवाना बंद कर दिया ।
भारत में 2015-16 में ग्रामीण घरों की माशिक आय 8059 थी , आप ही बताए कि अगर जिस घर में 5-6 सदस्य हुए तो क्या वो लोग अपने बच्चों को बहतर जीवन दे पाएँगे ? राष्ट्रीय आयकर का 28% कर यहीं से आता है , बावजूद इसके यह आंकड़ा गिरता क्यों जा रहा है ? 21 वीं शताब्दी में किसानों की आत्महत्या एक बहुत बड़ा विषय है । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2011 में 14027 किसान 2012 में 13754 किसान 2013 में 11772 किसानों ने आत्महत्या की।
यही आँकड़ा अगर 1995 से 2013 तक देखा जाय तो अकेले भारत में 296438 किसानों ने आत्महत्या की है , ये आंकड़े 31 मार्च 2013 तक के हैं । 2013 में कृषि संबंधित स्थायी समिति ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि किसान अब खेती से मुँह मोड़ रहे हैं ।
आज भी जब देश में 60% आबादी खेती पर निर्भर हो और तमाम सरकारी नीतियों और योजनाओं जैसे फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन , राष्ट्रीय कृषि विकास योजना लगभग 100 से भी ज्यादा ऐसी हितकारी योजनाओं के बावजूद जब किसान अपने आप को इस हालत में बेहाल पाता है तब हमें उस वक़्त आत्मचिंतन, आत्मावलोकन और आत्ममंथन की जरूरत है।
बेशक आज की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारों को किसानों को सही मौसम की जानकारी उपलब्ध कराना ( क्योंकि आज भी ज्यादातर खेती मौसम के पानी पर ही निर्भर है ) , उचित खाद्य , बीज , उचित कीमत , समय पर कर्ज उपलब्ध कराना , सस्ते कृषि उपकरण मुहैया कराना, मंडी सुविधा और सही मार्केटिंग उपलब्ध कराना चाहिए पर इसके साथ ही जो हम शायद आज नहीं देख पा रहे हैं वो कारण है जनसंख्या को नियंत्रित करना।
बेशक आज हमारे पास पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध है पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि बावजूद इसके भारत का नंबर ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 97 वे पायदान से खिसकर 100 वे पायदान पर आ गया है। हां इसके कारण हमारा पर्याप्त भण्डारण ग्रह का न होना , और संसाधनों को सही से वितरण करने से जुड़ा है पर जिस हिसाब से खाने वाले मुँह अनियंत्रित तरीके से बढ़ते जा रहे हैं उसके मुकाबले खिलाने वाले हाथ कम होते जा रहे हैं।
अगर हम खा भी पा रहे हैं तो हमको पता है कि कैसे हमने सिर्फ जरूरत पूरी करने के लिए रसायनिक पदार्थों का उपयोग किया है , जो अंततः हमें बीमारियों के ढ़ेर पर बैठा देगा , और बैठा दिया है । अगर निरंतर हमारी जनसंख्या यूहीं बढ़ती रही तो देश की कृषि भूमि का दोहन होने में ज्यादा वक्त न लगेगा , जब किसान के पास अपनी उपजाऊ जमीन नहीं होगी तो आने वाले समय में जमीन की गुणवत्ता का गिरना स्वाभाविक है ।
किसान के कन्धों पर यूहीं खाने वालों का बोझ बढ़ता रहेगा । वनों और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता जायगा । जिससे एक विकराल स्थिति पैदा होगी जहाँ न तो अन्नदाता खुश रहेगा और न आम नागरिक । यहाँ मिर्जा गालिब का वो कहा गया वाकया मुझे याद आता है – “उमर भर ग़ालिब यही भूल करता रहा धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा “।
यही सरकारों के साथ हो रहा है जहां उन्हें लगता है वो बहतर नीतियां बनाकर इस जनसँख्या को बिना नियंत्रित किये देश की वन संपदा , उपजाऊ भूमि की उपलब्धता , अन्नदाताओं का बोझ ( उनकी लागत के पैसे से ज्यादा कमाई उनको उपलब्ध कराना ,जो माँगने वालों के तादाद के साथ साथ बढ़ती ही जायगी ) , रासायनिक खादों का उपयोग जो अभी तो हमने 80 गुना बढ़ाया है आबादी के हिसाब से ।
ये सिलसिला आगे बढ़ता जाएगा जिससे देश सिर्फ़ कमज़ोरी की तरफ अग्रसर होगा सरकारों को चाहिए वो जनसंख्या को नियंत्रित कर , अन्नदाताओं के कन्धों से बोझ को हल्का कर , प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बारे में सोचें साथ ही साथ इस बात पर भी ध्यान दें कि कैसे किसान का जीवन बहतर और खुशहाली की तरफ अग्रसर होगा , उन्हें अपने फ़सलों में रसायनिक पदार्थों को सिर्फ इसलिये नहीं मिलाना पड़े कि उपजाऊ भूमि कम रह गयी है , या इस बढ़ती जनसंख्या का पेट भरा जा सके।


