कविता शायरी 

गरीब

इंसान को इंसान से,
बहुत दूर कर जाती है।
वो और कुछ नही मित्र,
गरीबी कहलाती है।

बरसात की बझाड़ में,
भीगता शरीर है।
महँगाई की मार में,
काँपता गरीब है,

कभी भूखे पेट ही रहता है,
और बीमारियों से लड़ता है।
दो रोटी को भी तरसता है,
ना जाने कहाँ वो भटकता है।

तन मलीन हो जाता है,
पर मन पवित्र कहलाता है।
यही मानकर वो गरीब,
धरती पर सो जाता है।

वो कैसा हुनर जानता है,
मुश्किल में मुस्काता है।
सूखी हड्डी का शरीर लिए,
चट्टानों से भी लड़ जाता है।

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