भारत विकास की राह पर

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। इसके साथ ही भारत परिवर्तनों के लिए हमेशा तत्पर रहा है ।
कोई भी देश विकास तभी कर सकता है जब वह उदार होकर अपनी परिपाटी में परिवर्तनों को स्वीकार करे ।2018 का सितंबर भारत के लिए एक अहम महीना जो रूढियों से हट कर एक नई पहल करने का महीना कहा जा सकता है ।
हाल ही में संविधान में हुए कुछ परिवर्तनों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है के संविधान देश के लोगों के लिए है न कि उनकी इच्छाओं व अधिकारों को दबाने के लिए। कोई भी कानून किसी विशेष समय की मांग व जरूरत होती है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि उसकी प्रासंगिकता हमेशा उसी तरह बनी रहे ।
भारतीय संविधान की धारा 377 के अनुसार समलैंगिकता कानूनी अपराध था। वहीं भारतीय समाज में इसे एक विकृत माना जाता है लेकिन बदलते समय को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने यह माना कि यह विकृति नहीं हो सकती तथा लैंगिक संबंध पूर्ण रूप से निजी मामला है।
वहीं धारा 497 को हटाकर भारतीय संविधान में एक अहम परिवर्तन किया गया । जहां अब तक विवाह के बाद किसी अन्य स्त्री या पुरुष से संबंध बनाना कानूनी अपराध था वहीं अब पति पत्नी के आपसी सामंजस्य से किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध बनाना कानूनी अपराध नहीं है ।
दक्षिण भारत के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के निषेध का खंडन करते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के लिए भी प्रवेश प्रारंभ किया जो अब तक वर्जित था।इसके पीछे धार्मिक मान्यता थी और कानून धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत इसमें दखलंदाजी नहीं कर सकता था।
सितम्बर दो हजार अठारह में दीपक मिश्रा की बेंच ने यह फैसला सुनाकर यह सिद्ध कर दिया कि भारत महिलाओं की समानता के लिए अहम फैसले जरूर लेगा।

