अमर शहीद खुदीराम बोसEntertainment 

अमर शहीद खुदीराम बोस का क्रांतिकारी जीवन परिचय

अमर शहीद खुदीराम बोस आज़ादी की फिल्म का एक ऐसा नायक और एक ऐसा किरदार है जो कभी आज़ादी के इतिहास के मुख्य पृष्ठ पर देखने को नहीं मिला, क्योकि फिल्म चाहे कोई भी हो ख्याति और पहचान उसी हीरो को मिलती है जो फिल्म के एन्ड तक जीवित रहता है चाहे उसने अपना किरदार निभाते समय केवल डमरू ही क्यों न बजाया हो …डमरू बजाने बाले ख्याति प्राप्त कलाकारों से भी आप भली भांति परिचित है इसलिए ऐसे कलाकारों के नाम का स्पष्टीकरण करना में जरूरी नहीं समझता|

अमर शहीद खुदीराम बोस

क्योकि मेरी कलम का केवल एक ही कार्य है और वो है बलिदानी व् राष्ट्र भक्ति से औत प्रोत किरदारों व् नायको के चरित्रों पर लिखना व् उन पर चर्चा करना तो आइये बात करते खुदीराम जैसे आज़ादी के महान किरदार व् नायक की ….अमर शहीद खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को हुआ था इनकी जन्म भूमि व् गावं का नाम हबीबपुर है जो बंगाल के मिदनापुर जिले के अंतर्गत आता है|

बचपन में ही माता पिता के गुजर जाने बाद परिवार के नाम पर इनके पास केवल अपनी माँ समान बड़ी बहन के ममता का आँचल था जिसके साये में इन्होने अपना बचपन गुजारा और मात्र 16 साल की उम्र में ही आज़ादी के हवन कुंड की अग्नि से ये राष्ट्र दीपक ज्वलित होने लगा जिसके परिणाम स्वरूप मात्र नौवीं कक्षा में ही पढ़ाई से त्याग पत्र देते हुए जाने माने क्रांतिकारी सत्येन बोस के नेतृत्व में इन्होने अपने क्रांतिकारी जीवन का शुभारम्भ कर मातृ भूमि के चरणों में अपना जीवन समर्पित करने का दृण निश्चय कर लिया|

अमर शहीद खुदीराम बोस

अब ये 16 वर्ष का नवालिक युवा वन्देमातरम् के पर्चे बाँट लोगो में राष्ट्र प्रेम और आज़ाद भारत के सपने को साकार करने का साहस जगा रहा था और इस साहस के परिणाम स्वरूप 16 मई, सन 1906 को अंग्रजी हुकूमत के आदेश पर पुलिस द्वारा इन्हे पहली बार गिरफ्तार किया गया लेकिन आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया लेकिन सायद अंग्रेजी हुकूमत को ये पता नहीं था कि जिसे वो छोटा बच्चा समझ रहे है वो निकट भविष्य में उन्ही के दांत खट्टे कर देगा और जल्द ही परिणाम स्वरूप इस नसमझी का खामयाजा भी अंग्रेजी हुकूमत को भुगतना पड़ा …क्योकि अंग्रेजी हुकूमत का एक क्रूर अधिकारी किंग्सफर्ड जो क्रांतिकारियों के लिए सिर दर्द बना हुआ था ..और ऐसे क्रूर अधिकारी का खात्मा करना क्रांतिकारियों के लिए भी अतिआवश्यक हो गया था …जिसके खात्मे के लिए जिन क्रांतिकारियों को चुना गया उनमे से एक नाम अमर शहीद खुदीराम बोस का भी था और दूसरा नाम वीरेंद्र कुमार घोष का था|

ये दोनों ही क्रान्तिकारी अब किंग्सफर्ड की हत्या को अंजाम देने के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर आ गए और इंतकाम के समय की प्रतीक्षा करने लगे लगभग 15 से 16 दिन की प्रतीक्षा के बाद आखिर वो दिन आ ही गया जिस दिन की ये प्रतीक्षा कर रहे थे| 30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्सफर्ड अपनी पत्नी के साथ एक क्लब पंहुचा जिस बग्गी से वो पत्नी के साथ क्लब पंहुचा था ठीक उसी से मिलती -जुलती बग्गी से एक और महिला अपनी बेटी के साथ क्लब में पहुंची और उनके लौटते समय खुदीराम बोस और वीरेंद्र कुमार घोष दोनों ही गलतफैमि का शिकार हुए और उन्होंने गलत बग्गी पर बम फैक दिया इस घटना के कुछ समय पश्चात् ही खुदीराम बोस पूसा रोड रेलवे स्टेशन से पकड़ लिया गया जो आज अमर शहीद खुदीराम बोस के नाम से जाना जाता है|

खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफर्ड को मारने का प्रयास किया था। लेकिन, इस बात पर बहुत अफसोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी गलती से मारे गए यह मुकदमा केवल पांच दिन चला 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया और आज़ादी के हवन कुंड की अग्नि में प्रज्वलित होता ये दीपक हिन्दुस्तान के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया और आज भी अपने क्रान्ति के दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रकाशमान कर रहा है|

आज आइये हम भी ऐसे क्रांतिकारी व्यक्तित्व को स्वयं के अंदर धारण कर राष्ट्र हित में जीने मरने का संकल्प लेकर इस क्रान्तिकारी व्यक्तित्व को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करे

जय हिन्द वन्दे मातरम्

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