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सलीब पर टंगा क्रिकेट

आजकल आइ.पी.एल.यानी क्रिकेट का महाकुंभ चल रहा है। चारों तरफ़ बस इसी का शोर है, टी.वी.हो या अख़बार, आइ. पी. एल के विज्ञापन और समाचार। सब में बस आइ.पी.एल. छाया है। पूरे पूरे पेज के विज्ञापन, नई-नई मन को लुभाने वाली, आइ. पी. एल. को बढ़ावा देने वाली ऑफ़र और वह सब जो अधिक पैसा कमाने का माध्यम हो सकता है।

इस क्रिकेट में सब कुछ बिकाऊ है। सबसे पहले टीम बिकती है। फिर खिलाड़ियों कीं नीलामी होती है। खेल में लगने वाले चौके, छक्के, गिरते विकेट और बनते रन, ये सभी पैसा कमाने वाले कमाऊ पूत है। प्रसारण अधिकार, खेल के दौरान बिकने वाली टी.शर्ट और भी सब कुछ। और खेल पर लगने वाला सट्टा, वो अलग।
यानी बस पैसा, पैसा और पैसा।

एक समय था जब क्रिकेट भद्र जनो का खेल था। पाँच दिवसीय टेस्ट मैच कलात्मक तरीक़े से खेला जाता था। पाँच से तीन और फिर एक दिवसीय क्रिकेट आया। फटाफट क्रिकेट की शुरुआत हो गई। लोगों ने कहा क्रिकेट की आत्मा खो गई।
पर ये अंत नही शुरुआत थी।

कैरी पैकर ने अपनी टीम बनाई और क्रिकेट का सर्कस प्रारम्भ हो गया था।
फिर आया 20-20 यानी इंस्टंट क्रिकेट। दो मिनट के नूडलेस जैसे फटाफट। खेल शुरू और ख़त्म, मनोरंजन भरपूर।

आज के युग में कौन पाँच दिन का खेल देखे और खेले और तब भी हार-जीत होगी या नही अनिश्चित रहता है। तो यह बदलाव तो स्वीकार्य था। पर इस फटाफट वाले खेल में सब कुछ है पर वो खेल नही है जो भद्र जनो का खेल था। अब ये कला नही है और खिलाड़ी कलाकार नही है। अब तो रन बनाने की मशीन है हमारे खिलाड़ी। विकट बटोरने वाले ये हमारे खिलाड़ी।
इनके खेल पर नाचती चीयर गर्ल्स।

ये क्रिकेट है क्या?
ये तो बस एक ड्रामा है जो पैसे कमाने के लिए होता है।
इनका खेल के वास्तविक स्वरूप से कोई लेना देना नही है।
क्रिकेट की हत्या कर दी गई है या यूँ कहिए क्रिकेट को कील ठोक कर सलीब पर लटका दिया गया है!

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