गुरु की महिमा
एक ज़िन्दगी एक ही जान,
ना जाने क्यों परेशाँ इंसान।
माया योनि में फंसा हुआ,
भूल गया खुद को इंसान।
बुन रहा है खुद ही ये जंजाल,
जिसका ना कोई आर और पार।
ये पाप-पुण्य का खेल जो चलता,
इसी से दानव मानव बनता।
संगठन, सहयोग, सफलता,
इसी से मानव धर्म है चलता।
हे परम पुरुष दाता दयाल,
जीवों के रक्षक मेरे कृपाल।
प्रगट हुए गुरु रूप धरा,
रहमत से मानव को तरा।
ज्ञान की ज्योति हृदय जगाई,
खुद से मानव की पहचान कराई।


????atyant Badhiya