कविता शायरी 

घुमक्कड़ी

घुमक्कड़ी भी कला है, घुमक्कडों से पूछो। सफर ये बड़ा है, थोड़ा तो सोचो।। मंज़िल नही है कोई, जिज्ञासा अथाह है। दिल भी ना जाने, की जाना कहाँ है।। राहें बनी है साथी, हवाओं में नशा है। डूबते हैं इसमें, तैरना किसे पता है।। खड़ी वादियाँ, बाहें फैलाए। मानों ये जैसे, मुझे बुलाए।। कदमों को जैसे, रुकना नही है। चलते है रहना, थकना नहीं है।। खो कर सफर में, पा लूँ मैं खुद को। की मौत भी मेरी, हँसीन बन जाए।। Sonam Kharwar

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