जरूरी है करवा चौथ के व्रत का सामाजिक और सांस्कृतिक विश्लेषण
हमारे देश में कल धूमधाम के साथ सभी पतिव्रता महिलाओं ने करवा चौथ का त्यौहार मनाया। प्रत्येक वर्ष यह त्यौहार सभी सुहागन औरतों द्वारा अपने पति की लंबी उम्र की कामना करने के लिए मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस त्योहार का बहुत महत्व है। हमारे हिंदू धर्म में सोलह संस्कार बताए गए हैं। विवाह को तेरहवां संस्कार माना जाता है। हमारे यहां पति-पत्नी का जीवन का संबंध सात जन्मों का होता है। पति पत्नी दोनों सात वचनों को पूरा करने का वादा कर एक दूसरे के साथ सात जन्मों के लिए जुड़ जाते हैं। हमारे देश में पति पत्नी के रूप में संबंध स्थापित होने के बाद दोबारा अलग होने की कोई परंपरा नहीं है। मगर पिछले कुछ वर्षों में देश में तलाक का चलन बहुत जोरों से बढ़ा है। ऐसे में करवा चौथ का सामाजिक और सांस्कृतिक विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।
क्यों आवश्यक है करवा चौथ का सामाजिक और सांस्कृतिक विश्लेषण?
दुनिया भर में सबसे कम तलाक लेने के मामले भारत में ही सामने आते हैं। इसका कारण यह है कि भारत की 80% आबादी हिंदू धर्म को मानने वाली है और हिंदू धर्म में तलाक का कोई सामाजिक प्रावधान नहीं है। 2019 की प्रोग्रेस रिपोर्ट ऑफ वूमेन 2019 – 20 में यह बताया गया है कि पिछले 20 वर्षों में भारत में तलाक का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। दरअसल यह कलयुग है और इस युग में सतयुग और द्वापर जैसी अपेक्षा करना भी मूर्खता ही है। मगर आज भी देश के कई हिस्सों में करवा चौथ का त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। करवा चौथ को मूलतः उत्तर भारत का त्योहार माना जाता है। इसे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश राजस्थान हरियाणा दिल्ली में मनाया जाता है।
फिल्मों में दिखाया गया करवा चौथ का त्यौहार
90 के दशक में फिल्मों में करवा चौथ के त्यौहार को काफी महत्व दिया गया और यह फिल्में लोगों द्वारा पसंद भी खूब की गई। जिसके बाद अब करवा चौथ का त्यौहार देश के कोने कोने में मनाया जाने लगा है।
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