फांसी की सजा कितने बजे दी जाती है ? इस सवाल का जवाब जान कर उड़ जायेंगे आपके होश
इसमें कोई शक नहीं कि हमारे भारत देश में कोई भी काम मुहूर्त देख कर ही किया जाता है. जी हां भले ही वो अच्छा काम हो या बुरा काम, लेकिन हर काम समय देख कर ही किया जाता है. यही वजह है कि हमारे भारत देश में फांसी देने का भी एक सही समय होता है. वैसे अगर हम आपसे पूछे कि हमारे देश में एक कैदी को फांसी की सजा कितने बजे दी जाती है. तो इस सवाल पर आपका क्या जवाब होगा. यक़ीनन इस सवाल के जवाब में आप यही कहेंगे कि किसी भी व्यक्ति को फांसी की सजा प्रात काल के समय ही दी जाती है. मगर आज हम आपको बताएंगे कि एक कैदी को फांसी की सजा कितने बजे दी जाती है.
फांसी की सजा कितने बजे दी जाती है..
यानि आज हम आपको फांसी देने का सही और निश्चित समय बताएंगे. वैसे भी हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग होंगे जो इस सवाल का जवाब जरूर जानना चाहते होंगे. तो चलिए आपको इस सवाल के जवाब से रूबरू करवाते है. अब इसमें तो कोई शक नहीं कि यमराज जी किसी भी व्यक्ति को या तो प्रात काल के समय उठा कर ले जाते है या फिर रात के समय ले कर जाते है. ऐसे में यमराज जी की सुविधा का ध्यान रखते हुए हमारे देश में फांसी की सजा साढ़े चार बजे दी जाती है. जी हां प्रात काल साढ़े चार बजे ही किसी अपराधी को फांसी पर लटकाया जाता है. इससे न एक मिनट पहले और नही बाद में बल्कि ठीक इसी समय पर दोषी को फांसी की सजा दी जाती है.
हालांकि हमारे देश में फांसी की सजा देने का रिवाज बहुत ही कम देखने को मिलते है. जी हां यहाँ मुश्किल से ऐसे केस देखने को मिलते है जिसमे किसी अपराधी को फांसी देने जैसी कठोर सजा दी जाती है. यानि अगर हम सीधे शब्दों में कहे तो यहाँ अगर किसी व्यक्ति ने कोई बड़ा अपराध किया हो तो उसे दस से बीस साल की सजा सुनाई दी जाती है. वही अगर सजा किसी बच्चे ने की हो तो उसे सुधरने के लिए भेजा जाता है. इसके इलावा अगर अपराध किसी बुजुर्ग ने किया हो तो उस पर तरस खा कर उसकी सजा को कम कर दिया जाता है. हालांकि ये गलत है, लेकिन हमारे देश का कानून कुछ ऐसा ही है.
वैसे इसे पढ़ने के बाद इतना तो समझ आ ही गया कि हमारे देश में फांसी की सजा कितने बजे दी जाती है.
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hello everyone, my name is Rajni Goyal. i am a writer but on the other side i love music. to be very frank i also even don’t know what i want to do in my life. लेकिन अगर अपनी भाषा मैं कहूं तो…. भटकती हुई मुसाफिर हूँ, मंजिल की तलाश है, जहाँ मंजिल दिख जाएँ वही लिखा हमारी किस्मत का असली आगाज है।



