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दिव्यांग वर्ग की भारत गाथा, रोज़ का संघर्ष

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बहुत अच्छी बात की थी| वो लोग जो शारीरिक या मानसिक अक्षमता से जूंझ रहे हो उनके लिए विकलांग वर्ग जैसे कठोर शब्द इस्तेमाल कर के दिव्यांग वर्ग शब्द का इस्तेमाल किया जाये| ये सोच सहरानीय है परन्तु क्या दिव्यांग समुदाय के लिए भारत वासियों के सोच काफी है?

दिव्यांग वर्ग
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इस बात में कोई दो राय नहीं है की भारत का एक बड़ा तबका अंधविश्वासी है| यह काफी बड़ा तबका ये मानता है की शारीरिक या मानसिक अक्षमता पिछले जन्म में किये गए पापो का नतीजा है| दिव्यांग वर्ग को कठिनाई से इस लिए जूझना होता है क्यूंकि उन्होंने अपने पुराने जन्म में कुकर्म किये हैं और उन्हें उसका प्रायश्चित करना होता है| ये सोच हमें दिव्यांगों के लिए दया से ज़्यादा कुछ नहीं दे सकती| उन्हें हमारी घृणा चाहिए हमारी दया| उन्हें चाहिए तो सिर्फ एक नागरिक होने का समूचा अधिकार|

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गौरतलब ये भी है की गरीब वर्ग में जिस्मानी अक्षमता की तादात ज़्यादा होती है| कही कही जिस्मानी अक्षमता का सीधा सीधा समभंद सुविधाओं की कमी से है| शारीरिक अक्षमता अतः पुराने जन्मे का पाप होक इस जन्म की सरकार की अक्षमता लगती है|

रोज़ का संघर्ष

२०११ की जनगड़ना को माने तो २६० लाख लोग दिव्यांग की श्रेड़ी में आते हैं| इन लोगो के लिए रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी किसी चुनौती से कम नहीं है| इनके लिए बुनयादी पूर्वावश्यकता तक भी पहुँच एक बहुत बड़ी बात होती है| शौचालय से लेकर बस तक हर कदम पर इन्हे अपर्याप्त महसूस कराया जाता है| मुंबई की जान मानी जाने वाली लोकल ट्रेन का ही उदाहरण ले लीजिये| ये इस शहर का एक अभिन्न अंग है जो की पूरी तरह से दिव्यांग वर्ग की पहुँच दे बहार है|शायद इस बात पर हमारा या आपका ध्यान भी जाता हो परन्तु कदम कदम पर हमारी प्रणाली दिव्यांग वर्ग के साथ भेद भाव करती है|

दिव्यांग वर्ग
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गर्व का शहर ग्वालियर

ग्वालियर शहर इस मामले में सबसे अच्छा उदहारण प्रस्तुत करता है| नरहरि नमक एक कलेक्टर ने इस शहर को भारत का सबसे संवेदनशील और सुलभ शहर बना दिया है| ९५ प्रतिशत ग्वालियर दिव्यांग वर्ग के साथ भेद भाव नहीं करता और ही उनके पहुँच से परे है|

दिव्यांग वर्ग
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बात मानवाधिकार की है

बुनयादी सुविधाओं के हक़ से एक पूरे वर्ग को वंचित रखना उनके मानव अधिकारों का हनन करना है| गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करने के हक़ का हनन करना किसी भी देश के लिए गर्व की बात नहीं होती| भारत पूरे दिव्यांग वर्ग किए इस हक़ का हनन रोज करता है|

दिव्यांग वर्ग
दिव्यांग वर्ग

शिक्षा प्राप्त करने के हक़ के नाम पर दिव्यांग वर्ग को से प्रतिशत आरक्षण मिलता है शैक्षड़िक संस्थानों में परन्तु इन्ही संस्थानों में इस वर्ग का एक जगह से दूसरी जगह जाना भी दूभर होने पर यह आरक्षण एक बुरा मज़ाक लगता है| कई संस्थानों में रैंप जैसी सुविधाएं तो दूर की बात है, इनके लिए अभिगम्य शौचालय भी नहीं होते हैं| “Illiterate National Convention of Youth with Disabilities” की माने तो दिव्यांग वर्ग के ४५ प्रतिशत लोग अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते हैं अतः अपने शिक्षा पाने के हक़ से वंचित हैं|

सरकार के कदम

सरकार इनकी ज़रूरतों को लेकर इतनी असंवेदशील है की उन्हें एहसास भी नहीं की दिव्यांग वर्ग की बुनयादी ज़रूरत क्या है| व्हीलचेयर जिसके बिना काफी लोगों की जोइंदागी दूभर है १८ प्रतिशत जी..टी. के साथ आती थी| काफी विरोध के बाद भी इसे हटाने की जगह काम करके प्रतिशत कर दिया गया है| अगर वो दिव्यांग जिसे इस व्हीलचेयर की ज़रुरत है गर्रेब तबके का है तो प्रतिषत भी उसस्के लिए एक बहुत बड़ी कीमत हो जाती है|

अधकतर राज्यों की सरकार दिव्यांग वर्ग को भत्ता प्रदान करती हैं| परन्तु ये औसत भत्ता लगभग ५०० रूपए प्रति माह होता है| सबसे अधिक भत्ता दिल्ली सरकार देती है जो की २५०० रूपए प्रति माह हैआज की महंगाई देखते हुए ये भत्ता एक दर्दनाक मज़ाक लगता है|

दिव्यांग वर्ग
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इसका ये कतई मतलब नहीं है की कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है| “Rights of Persons with Disabilities Bill” २०१४ में लोक सभा में पारित हुआ था| ये कई मायनो में एक अच्छा कदम था| इस विधेयक के पारित होने बाद अब सरकार की जगह २१ अक्षमताओं के हिसाब से काम करती है| इस विधेयक के तहत दिव्यांग वर्ग को प्रतिशत आरक्षण भी मिलेगा| इसके अलावा उनके खिलाफ भेद भाव करने वाले व्यक्ति को जुर्माने से लेकर जेल की सजा तक का प्रावधान है| ये वाकई में सही दिशा में एक कदम है|

विज्ञान की राह में है असली रास्ता

इन कदमो से भी बड़ा अगर हमें कुछ करना है तो विज्ञानं में भी हमें भारी मात्रा में निवेश करना होगा| आज से कुछ वर्ष पहले ही की चश्मे की पावर वाला इंसान लगबघ अँधा माना जाता था और दिव्यांग वर्ग में आता| लेकिन आज चश्मे की मदद से वो एक साधारण जीवन जी पा रहा है| आज से कुछ वर्ष पहले ही अगर कोई इंसान अपने पैर गवां देता था तो उसस्के पास कोई चारा नहीं होता था| आज वह जयपुर फुट जैसे अविष्कारों की मदद से पारंपरिक जीवन व्यतीत कर सकता है|

एक अनुसन्धान की माने तो दिव्यांग वर्गबोझनहीं है| इसके ठीक विपरीत वह एक अप्रयुक्त संसाधन है| उसी शोध के मुताबिक अगर दिव्यांग वर्ग को सही शिक्षा तथा प्रशिक्षण दिया जायेगा तो देश की जीडीपी से प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है|

दिव्यांग वर्ग के प्रति संवेदनशील होना तथा उनके हित में काम करना कोई परोपकार नहीं बल्कि शुद्ध मानवता है| हमें ये नहीं भूलना चाहिए की हम भी एक अनहोनी दूर हैं अपनी कोई भी क्षमता गवाने से और एक अच्छा देश वो है जो हर स्तिथि में आपका ध्यान रखे न केवल तब जब सब अच्छा चल रहा हो|

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दिव्यांग वर्ग के प्रति संवेदनशील होना तथा उनके हित में काम करना कोई परोपकार नहीं बल्कि शुद्ध मानवता है| हमें ये नहीं भूलना चाहिए की हम भी एक अनहोनी दूर हैं
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