डुसु इलेक्शन 2019 में एबीवीपी की हैट्रिक वाली जीत , अब जेएनयू की बारी ?
डुसु इलेक्शन 2019 : दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2019 के नतीजे सामने आ चुके हैं। इस बार डुसु चुनाव पीएम मोदी के प्रति युवाओं के विश्वास मत का दूसरा राउंड था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस ने अपने “केसरिया आशीर्वाद” से मोदी सरकार 2.0 की जनस्वीकार्यता पर मुहर लगा दी है। इस बार का चुनाव का भाजपा की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्(एबीवीपी) बनाम कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ़ इंडिया (एनएसयूआई) के बीच रहा। उम्मीद के मुताबिक ही भाजपा द्वारा समर्थित एबीवीपी ने डुसु की 4 सीटों में तीन पर हैट्रिक लगा जीत पा ली है और अपने ही संगठन से निकले और भाजपा के शीर्षतम नेताओं में रहे स्वर्गीय अरुण जेटली जी की आत्मा को विजयीपूर्ण श्रद्धांजलि दी है।
अध्यक्ष से लेकर जॉइंट सेक्रेटरी पदों तक एबीवीपी का कब्ज़ा , सेक्रेटरी पद ही मिला एनएसयूआई को
अब इस बार का डुसु चुनाव तो केवल एबीवीपी बनाम एनएसयूआई ही था जिसमें उम्मीद और जमीनी रुझानों की तर्ज़ पर भगवा स्टूडेंट ब्रिगेड को जीत नसीब हुई है। विद्यार्थी परिषद् के उम्मीदवार अक्षित दहिया ने एनएसयूआई की चेतना त्यागी को 19,039 वोटों से हरा कर अध्यक्ष पद अपने नाम किया तो वहीँ एबीवीपी के प्रदीप तंवर ने एनएसयूआई के अंकित भारती को 8,000 वोटों के अंतर से उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज़ की और तीसरे पद -डुसु जॉइंट सेक्रेटरी को शिवांगी खरवाल ने अपने नाम किया एनएसयूआई के अभिषेक छपराना को 2,053 वोटों के अंतर के साथ हराकर। एनएसयूआई के लिए केवल आशीष लाम्बा ने एबीवीपी के योगित राठी को हराकर डुसु सेक्रेटरी का पद अपने नाम किया वह भी मात्र 2,914 वोटों के मार्जिन से।
एनआरसी पर ममता दी का विरोध या हंगामा ?
डुसु इलेक्शन 2019 : जीत-हार और इन दो ज़रूरी बातों को याद रखिये ……..
इस बार के चुनाव के बारे में दो बात जानने लायक हैं। पहला आज यानी शुक्रवार को हुई मतों की गणना सुबह 8:30 बजे के पूर्व निर्धारित समय से दो घंटे देरी से हुई क्योंकि कैंडिडेट्स देर से पहुँचे। वहीँ एक दिन पूर्व गुरूवार को हुई वोटिंग का कुल प्रतिशत 39.90 रहा जो कि पिछले वर्ष के 44.6 प्रतिशत के मुक़ाबले काफी कम है और छात्र राजनीति में कम होते लोकतान्त्रिक जज़्बे को दुखद रूप में दर्शाता है।
एनएसयूआई तो इस बार चुनावी लड़ाई में थी भी नहीं तभी तो इतने बड़े अंतर से हार उसके मुँह पर तमाचे की तरह आई है और बेचारे कांग्रेसी छात्र नेता करें भी तो क्या ? टॉप लीडरशिप तो इतनी फिसड्डी है कि मीटिंग के दौरान मोबाइल फ़ोन बंद करवा देने के फरमान ज़ारी कर दिया ताकि कोई न्यूज़ बाहर मीडिया में लीक लीक न हो जाए ! यह तो है कांग्रेस के कंफ्यूज़न की पराकाष्ठा जिसमें हर कोई उलझा हुआ है वह भी इस कदर कि अब आरएसएस की तर्ज़ पर प्रचारक भूमिका का आईडिया चुराते हुए अपने यहाँ प्रेषक पद बनवाने की कवायद कर डाली जिसको पहले सबने मानने में आना-कानि करी फिर चलो नाम बदल ताकि “कॉपी कैट” का आरोप न लगे वाला वाहियात कुतर्क देकर प्रस्ताव को पास कर दिया क्योंकि मजबूरी भी तो इसलिए है कि “क्या करें भाई ? समझ ही नहीं आता कांग्रेस है ही कन्फूज़न का नाम।”
इसी के साथ ही एक सवाल की झलक छोड़ जाता हूं कि आने वाले थे जेनएयू इलेक्शंस जिस के रिजल्ट पर फिलहाल अभी रोक लगी हुई है क्या वहां भी लेफ्ट का गढ़ तबाह एबीवीपी केसरिया राज ला पायेगी ? यह तो वहां की मतगणना वाली पोटी ही खोलकर बता पाएंगी।
आइंस्टीन, न्यूटन और वो

Web Journalist
Ex- Punjab Kesari, Bihar Express, Unacademy


