सेवानिवृत्ति के बाद भी संवार रहे बच्चों का भविष्य
31 जुलाई 2011 को सेवानिवृत्ति के बाद से ही ये स्वतंत्र रूप से शिक्षा साधना में जुट गए। प्रतिदिन किसी न किसी विद्यालय में पहुंचकर छात्रों को शिक्षा देते हैं। 1975 में बीएड करने के बाद स्वामी शिवानंद उच्च विद्यालय करहंसी ( दिनारा) में पांच जनवरी 1977 से 30 दिसंबर 1981 तक शिक्षक रहे। रिटायर होने के गत पांच वर्षों से संझौली, बिक्रमगंज, नोखा व काराकाट प्रखंड के कई सरकारी व निजी विद्यालयों में घूम-घूमकर छात्रों को पढ़ाते हैं। पढ़ाने का शौक ऐसा कि राह चलते भी बच्चे जिज्ञासा प्रकट करते तो वे वहीं उसका उत्तर बताने लगते हैं। शिक्षा जगत में उन्हें ‘चलंत मुफ्त शिक्षा सेवा’ के नाम से जाना जाता है। कई बार शिक्षक भी इनसे समस्या का समाधान पूछते हैं।
संझौली के बीईओ ललित मोहन सिंह कहते हैं कि सेवानिवृति के बाद भी रामप्रवेश सिंह शिक्षादान के जरिए राष्ट्र निर्माण में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं। उनके इस समर्पण पर शिक्षकों को गर्व होता है। बुढ़ापे में भी साइकिल से स्कूल पहुंचने का जुनून उनके समर्पण को बयां करता है।
रामप्रवेश ने बताया कि किसी विद्यालय में जब कोई शिक्षक छुट्टी पर चले जाते हैं, तो उनकी भरपाई के लिए उन्हें बुलाया जाता है। विद्यालय प्रभारी फोन से उन्हें अपने विद्यालय में आने का आग्रह करते हैं। अगले दिन वे साइकिल से उस विद्यालय में पहुंच जाते हैं और पूरे समय तक बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे भी शिद्दत से उनका इंतजार करते रहते हैं। रामप्रवेश की साइकिल अगले दिन किसी अन्य मध्य या उच्च विद्यालय का रुख कर लेती है। यह सिलसिला हर दिन चलता रहता है। रामप्रवेश मूल रूप से छात्रों को अंग्रेजी व संस्कृत पढ़ाते हैं। जरूरत पड़ने पर अन्य विषयों को भी पढ़ाते हैं। कहते हैं कि जब जिंदगी में शिक्षक का किरदार मिल गया, तो उसको आजीवन निभाने का संकल्प ले लिया। गरीब व असहाय बच्चों को पढ़ाने में बेहद प्रसन्नता महसूस होती है।

