सीबीएसई पेपर लीक- असली ज़िम्मेदार कौन?
सीबीएसई बोर्ड के अभेद्य सुरक्षा घेरे को जान पर खेल पेपर लीक कर हमारे साहसी नौजवानों ने एक बार फिर दिखा दिया कि हम लोग पैसे के लिये कुछ भी कर सकते हैं।
देश की बैंकिंग व्यवस्था को धोखा दे सकते है। देश की सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज़ विदेश भेज सकते है। आतंकियो की सहायता कर सकते है।
तो छात्रों को अफ़सोस नही होना चाहिए कि सीबीएसई पेपर लीक हो गये।
सीबीएसई पेपर लीक तो हुए पर उनको ख़रीदने वाले कौन थे?
पेपर के बदले पैसे देने वाले भी तो छात्र या उनके अभिवावक ही तो थे।
आख़िर क्यूँ छात्र और उनके माता पिता कुछ नम्बरों के लिए इस तरह अनैतिक रास्ते अपनाते हैं?
जबाब सीधा सा है।
नम्बरों की दौड़!
पूरे नम्बर नही तो अच्छे कोलेज में दाख़िला नही। तो अगर कुछ पैसे दे कर सारी समस्या का हल मिल जाता है तो क्या बुराई है?
पेपर अब फिर से होगा। फिर से तैयारी करो।
सारे छात्र परेशान है। जिनका पेपर फिर से होगा वो भी और दसवीं वालों का नही होगा वो भी।
पर आख़िर उन बच्चों का क़सूर क्या है जिन्होंने जी तोड़ मेहनत की और नम्बर उनके आएँगे जिन्होंने छोटा आसान रास्ता अपनाया।
ऐसा कुछ भी नही होता अगर हमारे देश में यह नम्बर रेस नही होती।
अच्छे कॉलेज में दाख़िला लेना है तो सौ में से सौ नम्बर लाने का दबाव छात्रों और उनके माँ बाप को ग़लत तरीक़े अपनाने को विवश करता है।
ख़ामियाज़ा ईमानदार और मेहनती छात्रों को भुगतना पड़ता है। कड़ी मेहनत करके भी पूरे नम्बर नही आते।
अब इस समस्या से निजात पाने का कोई रास्ता हमें खोजना चाहिए ताकि छात्र नम्बर रेस के दबाव से निकल सके।
कॉलेज में दाख़िले की प्रणाली में परिवर्तन करना होगा।
प्रवेश प्रक्रिया नंबरों पर आधारित होने की बजाय प्रवेश परीक्षा पर आधारित हो।
सभी कॉलेज में नंबरों के साथ योग्यता भी देखी जाए।
और समाधान भी खोजने होंगे।
तभी सम्भव है कि छात्र वर्ग दबाव मुक्त हों सके।
इस नम्बर च्क्र्यूह से निकल सके।
यदि समय रहते क़दम नही उठाए गये तो यह वर्ग घुट कर रह जाएगा।
और ज़िम्मेदार होंगे हम सब!

