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केमिकल इंजीनियरिंग छोड़ कर यह विदेशी कर रहा भारतीय वेदों का प्रचार प्रसार

पूरब की लाली पश्चिम पर ऐसी छाई कि स्विट्जरलैंड से भारत आए उष्ठ स्ट्राबल आशुतोष बन गए और आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया। इतना ही नहीं, केमिकल इंजीनियरिंग का पेशा छोड़कर खुद को वेदों और गीता के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उत्तराखंड में कुमाऊं के कौसानी के बाद उन्होंने उत्तरकाशी के दूरस्थ गांव गजौली में वेद विद्यालय खोला। इस विद्यालय में वर्तमान समय में 36 छात्र नि:शुल्क अध्ययन कर रहे हैं।

उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर भटवाड़ी ब्लाक के गजौली गांव के पास वेद विद्यालय में ऋचाओं का सस्वर पाठ सुनकर आने-जाने वालों के कदम ठिठक जाते हैं। लगता है जैसे वैदिक युग के किसी गुरुकुल में पहुंच गए हों। दो कमरों के भवन के बाहर अहाते में टहलते हुए 72 वर्षीय आशुतोष बताते हैं कि वर्ष 1975 में भावातीत योग के प्रणेता महर्षि महेश योगी ने स्विट्जरलैंड में एक योग शिविर का आयोजन किया। शिविर में महर्षि से मुलाकात हुई।

बस यहीं से मेरे मन में भारतीय संस्कृति को जानने की उत्कंठा हुई। मैंने महर्षि से अनुरोध किया कि मुझे शिष्य बना लें। उनके सानिध्य में वेद, पुराण और गीता का अध्ययन किया। वह कहते हैं कि मैं केमिकल इंजीनियर था और योग शिक्षक बन गया। स्विट्जरलैंड में भारतीय संस्कृति का प्रचार करने लगा। वह बताते हैं कि वर्ष 1997 में
भारत आया और सीधे कौसानी पहुंचा। कौसानी में श्री अनामयन्यास विद्यापीठ वेद विद्यालय की नींव डाली। हिमालय की छटा से अभिभूत आशुतोष बताते हैं कि तब से कई बार उत्तरकाशी आना हुआ। मन में था कि यहां भी वेद विद्यालय खोला जाए। इस साल जुलाई में गजौली गांव में किराए पर दो कमरों का भवन लिया और स्कूल शुरू कर दिया। वह कहते हैं, ‘सांस्कृतिक समृद्धि के बावजूद आज युवा पाश्चात्य सभ्यता की ओर आकृष्ट हो रहे हैं।

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