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जानिए कि अमित शाह का ‘शाह’ कहां से आया?

प्रो. राकेश उपाध्याय, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
इरफान हबीब जैसे लोग प्रोफेसर हो गए, भारत के अकादमिक क्षेत्र की विडंबना नहीं तो और क्या कहें इसे? इनका लिखा और अनुसंधान किया हुआ जाने कितना साहित्य इनकी आंखों के सामने ही कचरा घोषित होता जा रहा है, बाकी बचा आने वाले कुछ वर्षों में कूड़े के भाव भी नहीं जाने वाला। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि ताजिन्दगी अयोध्या के जिस सच को ये बगैर कुछ सोचे नकारते रहे, वह इन्हीं की आंखों के सामने पुरातत्व की खुदाई के बाद सामने आ गया। शर्म मगर इनको आती नहीं। अब नया जुमला उछाल दिया कि अमित शाह का शाह शब्द या उपनाम तो फारसी है, गुजराती नहीं।
वस्तुतः भारतीय चिन्तन परंपरा का क-ख-ग से लेकर स-ष-श-ह तक की यात्रा के बारे में जो कुछ भी नहीं जानते, वही लोग राजनीतिक कारणों से भावावेश में आकर ऐसी बात कह सकते हैं कि शाह शब्द फारसी है। जो सचमुच सत्य के अन्वेषक हैं, वे तह तक जाते हैं और पता करते है तो हकीकत सामने आ जाती है कि शाह शब्द की वयुत्तपत्ति वैसे ही संस्कृत से होती है जैसे राज्य और राजा शब्द की। अब कोई राजा को रजा लिखने लगे और अब दावा करे कि रजा से राज्य और राजा बना तो उसके अध्ययन की बलिहारी।
पहले इरफान हबीब को कहना चाहूंगा कि वह पहले इस बात का पता लगाएं कि ईरान में जो प्राचीन शूशाः (SUSH) राजमहल था, जिसे आधुनिक समय में सुसा कहा जाता है, वह सुसा शब्द कहां से आया और इसके मायने क्या हैं? और यह प्राचीन शुशाः नगर तो इस्लाम के उदय के भी करीब एक हजार साल पहले का है। ईरान के इस प्राचीन शूशा राजमहल में जो शिलालेख मिला है, उसमें लिखा है-
पिरू शहाय इदा कर्त हचा कुष आ उता हचा हिन्दउव उता हचा हरउवतिया अवरिय् (पंक्ति 43-44)
अर्थात इस राजमहल के लिए जो हाथी दांत यहां सजाया गया, वह कुश इलाके से हिन्दु और हरवति की भूमि से लाया गया।
आप यहां हिन्दु को सिन्धु समझिए और हरवति को सरस्वती। सिन्धु और सरस्वती का उच्चारण इस्लाम के उदय के एक हजार साल पहले बड़े ही सम्मान जनक ढंग से हिन्दु और हरवती के रूप में इस शिलालेख में दिखाई देता है। इससे एक बात और पता चलती है कि ईसा पूर्व पांचवी सदी में ईरान में भारत की भूमि के लिए हिन्दु नाम प्रचलित हो चुका था। सोचिए कि हिन्दु शब्द कितना प्राचीन है और इस हिन्दू शब्द पर भी इरफान हबीन ने कैसे कैसे विवाद खड़े किए है?
ईसा की पहली सदी में चीन का सेनापति पन योंग चीन के सम्राट को पश्चिमी एशिया के बारे में एक ब्यौरे में यह जानकारी भेजता है कि थि-एन-चू अर्थात देवताओं का देश (भारत) शिन्तू नाम से भी यहां प्रसिद्ध है। स्पष्ट है कि भारत का बोलबाला समूचे संसार में प्रचलित था, न केवल आर्थिक महाशक्ति के रूप में बल्कि संस्कृति-धर्म और ज्ञान के महान स्थान के रूप में भी भारत की मान्यता चहुंओर गूंज रही थी। यही शिन्तू जापान में शिन्तो की मान्यताओं में बस चुका था, आज भी झेन आर्ट ऑफ हैपीनेस में भारत की मान्यताएं गहरे बैठी हुई हैं।
जहां से प्रारंभ किया, वहीं आता हूं। शूशा का तात्पर्य इरफान हबीब नहीं समझ सकते क्योंकि वह अज्ञान के अंधकार से खुद को बाहर निकाल पाने में शायद नाकाम हैं। हमारे यहां संस्कृत में एक शब्द है शः। इसे हिन्दी में पढ़ेंगे शह। उच्चारण जरा सा प्रांतशः आगे बढ़ेगा तो शाह हो जाएगा। संस्कृत में एक आज्ञा है एकशः संपत। एक साथ सभी एक पंक्ति में खड़े हो जाए। यह जो शह है, यही शाह है…इसके मायने मूल रूप में संस्कृत में जो बताए जाते हैं, वह आपको बता देता हूं…1- जो शिव है वह शह है 2- जो आनन्दमय है वह शह है 3-जो सब कुछ विनष्ट करता है वह शह है, जो शस्त्र धारण करता है वह शह है। जो साथ देता है और सहायता करता है वही शह है, वही शाह है।
सभी में इस देश ने शिव का ही स्वरूप देखा है, इसीलिए एकशः आज्ञा आज भी प्रचलित है। वह शिव शक्ति के साथ एक ही है। वह शह है, वह सह है। सः अर्थात संस्कृत में वह। तो वह कौन है, वह शह है और वही शाह है, वह सब जगत को चलाता है। वह शह जब राज्य धारण कर लेता है तो शाह हो जाता है, वह शंयु या शु होने पर शुभता धारण करता है, शंवः होने पर भाग्यवान हो जाता है, वज्र धारण करता है, शक्ति से दूर हो जाता है तो वही शह शव भी हो जाता है। वह शह शक्ति से जुड़कर शिवः कहलाता है। अतः वह शह ही शिव है। शह ही शंस है, शंसति है अर्थात वही शासन करता है। यह जगत उस एक शं का ही सार है, अतएव संसार है। अर्थात संपूर्ण जगत उस शह के शंश का प्रशंस है, अतएव वह शह ही प्रशंसनीय और शंसनीय है। वह शह ही वंशः है, वह शह जन्म- सृजन और विनाश है, वह नशः है इसीलिए मादक पेय नशा है।
संस्कृत का मंत्र है…सहनाववतु, सहनौभुनक्तु, सहवीर्यं करवावहै। वह शह है तो साथ है, रिश्ता है। वही शह ही वास्तविक सहाय है, सहायक है, सहायता है। इसीलिए कहा गया है कि शिवजी सदा सहाय। वह शह शाह है, साह है, सहा है, सहाय है। उसी सह के कारण ही हम आजतक सहते चले आ रहे हैं, वह सह है इसीलिए सहिष्णुता है। वह सह नहीं रहता तो असहिष्णुता आ जाती है। उस सह को जान लीजिए। वह सह ही भारत की सहन-शक्ति है, हम सहते हैं और हंसते हैं तो उसी एक सह के कारण। उस सह का साथ है तो फिर हमें किसी बात की कोई गिला नहीं। हम भयानक अंधकार में भी लड़ सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं क्योंकि वह सह सहयोगी बनकर हमारे साथ सदा ही रहता है।
भारत की अनेक जातियों, समूहों और बोलियों के साथ यह सह ही सहाय, साह, शाह, साव, सहा, शॉ, शा, सॉ, सा आदि अनेक रूपों में उनका उपनाम बनकर हजारों साल से जुड़ा हुआ है, वैसे ही जैसे यह शह शहंशाह शब्द के साथ जुड़कर राज्य और राजा का प्रतीक बन जाता है। सा लगाकर बुलाना हमारे देश में सम्मान का प्रतीक है, उस शह या सह से ही साहस है और उसी से सास, सांस और आश भी है।
बाहुबली फिल्म का वह दृश्य याद करिए जिसमें भल्लाल देव का राज्यारोहण होता है और कटप्पा आदेश देता है..उप विशः। अर्थात एक साथ बैठ जाइए। एक शः और उप विशः दोनों में यह शह मौजूद है। यह शह आदेश की ताकत बताता है कि जो कहा गया है उसका पालन करना ही होगा। राजमाता शिवगामी देवी भी फिल्म के एक दृश्य में कहती हैं-मेरा वचन ही है शासन। यह शासन शाःसन है। शः+आसन। जिस आसन पर शह बैठता है…वही है शासन अर्थात शाह आसन। इरफान हबीब को याद रखना चाहिए कि सनातन हिन्दु धर्मानुयायी शाही उपनामधारी शासकों का शासन इस्लाम के प्रादुर्भाव के हजारों वर्ष पूर्व अवगानिस्तान और ईरान के इलाकों पर था। आज जिसे ओहिन्द कहते हैं, वह हिन्दु धर्मानुयायी शाही या शाहवंशी राजाओं के शासन की प्राचीनतम राजधानी मान्य है।
यह तो रही शह और शाह शब्द की संस्कृत वयुत्पत्ति। यह शब्द फारस कैसे पहुंचा तो इसका अध्ययन भी इरफान हबीब को करना चाहिए और इस बात का भी कि शिव के निशान कैसे संपूर्ण पश्चिम एशिया से इस्लाम के उदय के बाद हटाए व मिटाए गए या आज भी हटाए व मिटाए जा रहे हैं लेकिन यह शिव मानवता और संपूर्ण जीव-जगत के डीएनए में समाया हुआ है, आप अपनी आंखों के सामने से इसे हटा सकते हैं, किन्तु इसे अपनी आंखों के पीछे से यानी अपने अन्तर्मन से कभी नहीं हटा सकते, जिस दिन इंद्रियों का खेल शरीर में डिरेल होता है, उसी दिन शक्ति और शिव का मेल समझ में आने लगता है। उसके बगैर यह जीवन ही बेमेल दिखने लगता है।
इरफान हबीब अब अमित शाह का अर्थ समझ गए होंगे। इसमें शाह का जो विनाश वाला रूप है, वह हबीब और उनकी परंपरा के लिए बिल्कुल सटीक है..वह शाह ही सारे अधर्म, विधर्म और विभ्रमों का नाश करने के लिए नए शाह के रूप मे तो पैदा नहीं हो गया?
ज़रा ध्यान से सोचिएगा, जैसा एक हजार साल तक आपके कथित मतानुयायियों ने भारत भूमि के साथ किया, वैसा करना असल शाह मंजूर नहीं करेगा लेकिन उतना तो जरूर करेगा जितने में आपको अपना वास्तविक रूप तो दिखाई पड़ जाए। आत्म विस्मृति में कब तक रहेंगे आखिर आप…समय है आंख खोलिए और खुद को पहचानिए. यही मातृभूमि है आपकी और यही लोकजीवन आपका अपना है…जो शिवजी को सदा सहाय, साह या शाह रूप में देखता चला आ रहा है। 
( इस शोधपत्र के लेखक भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सेन्टेनियल चेयर प्रोफेसर पद पर आसीन है। संपर्क ईमेलः rakesh.varanasi@gmail.com)

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