जानिए कि अमित शाह का ‘शाह’ कहां से आया? पार्ट-2
प्रो. राकेश उपाध्याय, भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वैदिक सूक्तों में शः अर्थात शह शब्द को सम्मान और शासन के अर्थ में जगत नियंता प्रभु से जोड़कर देखा गया है। इस आलेख के पिछले हिस्से यानी पार्ट-1 में संस्कृत के शः अर्थात शह शब्द की तात्विक व्याख्या के सन्दर्भ को हमने पढ़ा व समझा था। कालांतर में शह व्यक्ति वाचक रूप में राजाओं और नरेशों के नाम के साथ भी जोड़ा जाने लगा तो राजकीय उपनाम के रूप में शह, शाह अथवा सह, साह के प्रयोग के कई उदाहरण प्राचीन आख्यानों में प्राप्त होते हैं।
वाल्मिकी रामायण में साही, सहि और शह का उल्लेख अनगिनत बार अनेक सन्दर्भों में आया है। अयोध्या काण्ड में जब भगवान श्रीराम वनवास जाते हैं और कैकय और गान्धार इलाके में मौजूद ननिहाल से भरत का आगमन होता है तो अयोध्या की दशा को लेकर भरत अपने सारथि से अनेक प्रश्न पूछते हैं। इसमें कोशल देश के राजा को कोसलेशः अर्थात उच्चारण के अनुसार कोसलेशह बार-बार कहा गया है। एक श्लोक में भरत कहते हैं- नोत्सवाः सम्प्रवर्तन्ते रामशोकार्दिते पुरे। साहि नूनं मम भ्राता पुरस्यास्य द्युतिर्गता।
अर्थात अयोध्या में अब कोई उत्सव नहीं है। इस नगर की संपूर्ण शोभा तो मेरे भाई के साथ ही चली गई है। इस श्लोक में साहि शब्द का इस्तेमाल संपूर्ण के अर्थ में किया गया है।
और ऐसे श्लोक तो सैकड़ों की तादाद में हैं जिनमें क्रिया, विशेषण अथवा किसी भी अन्य रूप में सह, शाह या सहि, साही का उल्लेख आया है। उदाहरण के लिए-अतीत्यै एकाद शाहं तु नामकर्म तथा करोत।। 21.18 बालकाण्ड।। सिंह शार्दुलसदृशाः।। विष्णुनाम सदृशाः।। एकादशाह-द्वादशाह।। ब्रह्मा विष्णु महेशः यस्यांशाः।। रामं प्रतीक्षे राज्याय स हि राजा महायशाः।। श्लोक 3, सर्ग 115।। भरतः स महायशाः।। 22.115।। वनवास कृतोत्साहा।। 9.29 अयोध्याकाण्ड।। शक्तिमान स हि लोकस्य परिपालने।। 13.112।। रामं स हि विष्णु सनातनः।। यहां स हि शब्द साथ-संबंध या सहयोग के सन्दर्भ में भी उल्लिखित है।
महाकवि कालीदास ने रघुवंश नामके अपने महान साहित्यिक ग्रंथ में रघुकुल की जो वंशावली दी है उसमें सम्राट विश्वसह या विश्वसाह का उल्लेख सीधे तौर पर पाया जाता है। संस्कृत पद्धति में मूल नाम चक्रवर्ती नरेश विश्वसहः मिलता है, पुराणों में यह नाम विश्वासाह के रूप में उल्लिखित है जो भगवान श्री राम के पुत्र कुश (कुशः) की वंश परंपरा में नरेश व्युषिताश्वाह (बहुत दूर तक घोड़े ले जाने वाला) के पुत्र थे। इस सन्दर्भ के अनुसार, विश्वसाह रघुवंशी क्षत्रिय थे और उनका जन्म काशी विश्वनाथ की आराधना के फलस्वरूप राजा व्युषिताश्वाह के पुत्र रूप में हुआ। श्लोक निम्नवत है-
आराध्य विश्वेश्वरमीश्वरेण तेन क्षितेर विश्वसहो विजज्ञे। पातुं सहो विश्वसखः समग्रां विश्वम्भरामात्मजमूर्तिरात्मा।। श्लोक 24, अट्ठारहवां सर्ग, रघुवंश
इस सन्दर्भ में वर्णन आता है कि अपने पुत्र विष्णु के अंश हिरण्यनाभ को राजसिंहासन देकर विश्वसाह वन को चले गए। उन्होंने आश्रम परंपरा के अनुसार राज-पाट त्याग दिया। रघुवंश में स्थान स्थान पर रघुवंश परंपरा के अनेक राजाओं को महायशाः अर्थात महा-य-शाह भी संबोधित किया गया है।
हम जानते हैं कि महाकवि कालीदास के कालखण्ड को लेकर विद्वानों में अनेक मत है। कोई उन्हें ईसापूर्व विक्रमी संवत प्रारंभ करने वाले उज्जैनी के राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के रत्नों में स्थान देता है तो अनेक विद्वान उन्हें तीसरी सदी में गुप्त साम्राज्य के दरबारी कवि के रूप में स्थान देते हैं। उनकी सुप्रसिद्ध रचना मालविकाग्निमित्रं शुंगशासक अग्निमित्र के नायकत्व प्रसंग पर आधारित है और अग्निमित्र का समय 170 ईसापूर्व बताया गया है तो अनेक विद्वान उन्हें ईसापूर्व का मानते हैं।
छठी सदी ईस्वी में बाणभट्ट के ग्रंथ हर्ष चरित में कालिदास का उल्लेख मिलता है तो इतना तो सभी मानते हैं कि कालिदास 170 ईसा पूर्व से छठी सदी ईस्वी के मध्य ही हुए थे। जो भी हो कालीदास के समय भारत की सीमाएं पारसीक देश यानी ईरान तक फैली हुई थीं, इसके सन्दर्भ में स्वयं कालीदास ने रघुवंश में ब्यौरा दिया है, हालांकि यह ब्यौरा उन्होंने महाराजा रघु की विश्व विजय के सन्दर्भ में दिया है जिसमें पारसीक देश यानी ईरान को तत्कालीन भारत के चक्रवर्ती साम्राज्य का हिस्सा दिखाया गया है। रघुवंश महाकाव्य के चौथे सर्ग में महाकवि लिखते हैं-
पारसीकांस्ततो जेतुं प्रतस्थेः स्थलवर्त्मना। इन्द्रियाख्यानिव रिपूंस्तत्वज्ञानेन संयमी।। श्लोक 60, चतुर्थ सर्ग, रघुवंश
दक्षिण विजय के पश्चात् जैसे योगी ज्ञान से इन्द्रियों को जीत लेते हैं, वैसे ही महाराजा रघु फारस को जीतने के लिए स्थल मार्ग से चतुरंगिणी सेना लेकर आगे बढ़े।
संग्रामस्तुमुलस्तस्य पश्चात्यैरश्व साधनै। शारंगकूजितविज्ञेयप्रतियोधे रजस्यभूत।। 62, चतुर्थ सर्ग,रघुवंश
भल्लापवर्जितैस्तेषां शिरोभिः श्मश्रुलैर्महीम। तस्तार सरधाव्याप्तैः स क्षौद्रपटलैरिव।। 63, चतुर्थ सर्ग,रघुवंश
अर्थात-पश्चिमी देश की अश्वसेना से महाराजा रघु की सेना का घनघोर संग्राम हुआ जिसमें आसमान धूल से भर उठा और धरती रक्त से नहा उठी। मधुमक्खियों से व्याप्त मधु के छत्तों को चीर देने के समान भाले और बाणों से रघु ने उस फारस की सेना के सैनिकों के दाढ़ीवाले शिरों को काट-काटकर पृथ्वी को पाट दिया।
अपनीतशिरस्त्राणाः शेषास्तं शरणं ययुः। प्रणिपातप्रतीकारः संरम्भो हि महात्मनाम्।। 64, चतुर्थ सर्ग।
विनीताध्वश्रमास्तस्य सिन्धुतीरविचेष्टनैः। दुधुवुर्वाजिनः स्कन्धांल्लग्नकुंकुमकेसरान्।। 67, चतुर्थ सर्ग, रघुवंश
अर्थात-युद्ध में बड़ी संख्या में फारस के सैनिकों ने अपने सिर से टोपों को उतारकर रघु की शरण में आने की गुहार लगाई और वे सभी शरण में आने पर क्षमा पा गए, क्योंकि महान लोगों का क्रोध नम्रता से ही दूर होता है।… युद्ध से लौटकर सिन्धु नदी के किनारों पर कश्मीर के इलाके में रघु के सैनिकों ने केसर बिछी जमीन पर अपनी व घोड़ों की देह साफ की।
उपर्युक्त उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि प्राचीन भारतीय साहित्यिक स्रोतों के अनुसार, पारसी यानी फारस अथवा ईरान-इराक तक से भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध अत्यंत गहरे रहे हैं। पौराणिक साहित्य में इस सन्दर्भ में और भी गहरी जानकारी मिलती है। विष्णु पुराण और भविष्य पुराण में अनेक राजवंशों के राजाओं का वर्णन मिलता है जिसमें द्वापर युग में यदुवंशीय राजा शूरसेन को जहां मथुरा का शासक बताया गया वहीं श्मश्रुपाल को मरुदेश अर्थात अरब, ईरान और ईराक का शासक बताया गया है। इसी काल में राजा संवरण के वंश का उल्लेख आता है जिनमें एक राजा द्वाद शाहात्म और उनके पौत्रों में एक राजा मिहिर अर्थ का भी वर्णन है जिनकी वंश परंपरा कौरव और पाण्डव तक जाती हुई दर्शायी गई है।
पौराणिक साहित्य में इस बात का भी वर्णन मिलता है कि महर्षि कण्व अपने शिष्यों के साथ माता सरस्वती के आदेश से मिस्र आदि देशों की ओर प्रस्थान कर गए जहां उन्होंने दस हजार के करीब म्लेच्छवंशी युवकों को संस्कृत भाषा के साथ अन्य कई विषयों का ज्ञान प्रदान किया। कालांतर में महर्षि कण्व ब्रह्मावर्त यानी भारत के मूल सिन्धु-गंगा के मध्य क्षेत्र में लौट आए। इस प्रकार मय नामक असुर राजा के बारे में वर्णन मिलता है कि उसने म्लेच्छवंशियों को ज्योतिष से जुड़ी ज्योतिर्गणित, रेखा गणित आदि विषयों की जानकारी दी।
उपर्युक्त दावों के सन्दर्भ में सच्चाई कितनी है अथवा सब कपोल कल्पना ही है तो इस बारे में गहन शोध किए बिना कुछ भी कहना कठिन है। किन्तु इस सन्दर्भ में रोचक तथ्य यह है कि जब हम फारसी शब्दकोश और व्याकरण में वर्णित शब्दों, सूत्रों और अंकों के मूल स्रोत व सन्दर्भ खोजते हैं तो उनका संस्कृत से अत्यंत गहरा साम्य दिखाई देता है, मानो फारसी जैसे संस्कृत ही है या उसके बेहद करीब है। उदाहरण के लिए फारसी में सासान नामक जो जगह है उसके शब्द मूल के बारे में लिखा गया है कि बहमन (बांभन या ब्राह्मण) का लड़का जिसने संन्यास ले लिया, सासानी वंश का प्रारंभ उसी बहमन की वंश परंपरा से जुड़ा है। ( पृ. 686, फारसी-उर्दू-हिन्दी शब्दकोश, मुहम्मद मुस्तफा खान)।
इस आलेख के प्रथम भाग में इस बात का सन्दर्भ सविस्तार दिया गया था कि शाह शब्द संस्कृत के शः शब्द से निकला है। संयोग देखिए कि जो फारसी-हिन्दी शब्दकोश है उसमें तो शाह के उल्लेख के पहले शह का उल्लेख किया गया है। इसमें शह का अर्थ देते हुए कहा गया है कि शह माने शाह का लघु रूप। इसी से शहज़ादः, शहखर्च, शहसवार आदि अनेक फारसी शब्दों की व्युत्पत्ति बतायी गई है। यहां तक कि शाही शब्द का प्रारंभिक रूप भी शही शब्द को बताया गया है। शाह को फारसी में शहा भी कहा गया है। स्पष्ट है कि फारसी में शह ही शाह और शाही के रूप में विकसित हुआ है।
एक और शब्द हम देखते हैं फारसी में पाद जिसे हम संस्कृत में चरण या पांव के रूप में जानते हैं। फारसी में पा के मायने हैं पद, चरण, पग, पांव। इसी से फारसी शब्द बना है पादशह। इसे पादशाह भी पढ़ा जाता है। फारसी शब्दकोश में पादशह और पादशाह दोनों के मायने एक ही देते हुए दोनों को बादशाह लिखा गया है।
वाल्मिकी रामायण में इस पादशः का सुन्दर वर्णन मिलता है जिसमें भरत भगवान राम के वनवास से न लौटने के कारण उनकी चरण पादुका को ही शासन का अधिकार देकर घोषित करते हैं कि जब तक रामजी वनवास से लौटकर नहीं आएंगे उनकी पादुका ही शासन मानी जाएगी। पादशाही का संसार में यह पहला मूर्त प्रयोग अगर कहीं पाया जाता है तो वह रामायण में ही दिखता है।
इसी पातशाह को सच्चे गुरु नानक शाह फकीर के जीवन में हम सार्थक हुआ पाते हैं। सिखों की संपूर्ण गुरु परंपरा इस सच्ची पादशाही को आज भी मानती चली आ रही है। शिवाजी महाराज ने भी जिस हिन्दू पदपादशाही की स्थापना की थी तो उसका मूल उन्हें भारत की परंपराओं में ही दिखा रहा होगा न कि आक्रांता बनकर आए मुस्लिम शाहों से उन्होंने हिन्दू पदपादशाही स्थापित करने की प्रेरणा ली होगी।
फारसी शब्दकोश में बादशाह को बादशः, बादशह लिखा गया है। बादशः यानी बादशाह। तो यहां भी शः शब्द सार्थक होता दिखाई देता है यानी स्पष्ट है कि शः से ही शाह शब्द आया है। फारसी में बाद के कई मायने हैं। बादः शब्द के मायने होते हैं शराब। बाद शब्द का मतलब है वात यानी हवा, आशीर्वाद और अहंकार। बाद के मायने होना या रहना प्रत्यय भी बताया गया है। बाद को गति के रूप में भी दर्शाया गया है जैसे बादपा यानी घोड़े की गति से चलने वाला या तेज चलने वाला। तो बादशाह या बादशह का मतलब हुआ कि जो घोड़े पर सवार होकर हवा की गति से तेज जाता है अथवा जो गर्व और अहंकार में चलता है। जैसा कि पहले बताया गया है कि फारसी में पा के मतलब हैं चरण या पांव। तो बादशह की वयुत्पत्ति भी पादशह से होती है, इस विश्लेषण से विल्कुल स्पष्ट है। और यह पादशः भारत की परंपरा से ही निकलता है।
फारसी में एक दो नहीं बल्कि हजारों की तादाद में शब्द हैं जो संस्कृत से ही बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। अब ये भी कहा जा सकता है कि हो सकता है कि संस्कृत ही फारसी से निकली हो। तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा कैसे हो सकता है जबकि संस्कृत से फारसी की व्युत्पत्ति के सैकड़ों प्रमाण दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए फारसी के अंकों को ही ले लीजिए। फारसी गिनती ज़रा गौर से पढ़िए-यक, दो, त्रेसे, चाहार, पंज, शष, हफ्त, हष्ट, नोव, दहा, यकदाह, द्वाजदाह, त्रिजदाह, चहारदाह, पंजदाह, सषदाह या शानदाह, हफ्दाह, हष्टदाह, नोवदाह, बिष्ट, बिष्टो येक, बिष्टो दो…और ये गिनती सद यानी शत तक चली जाती है। संस्कृत में जो गिनती है, उसे देखिए- एकम, द्वे, त्रीणि, चत्वारि, पंच, षट्, सप्त, अष्ट, नवम्, दशम। एकादशः, द्वादशः, त्रयोदशः, चतुर्दशः, पंचदशः, षोडशः, सप्तदशः, अष्टादशः, एकोनविंशः, विंशः। तो संस्कृत का शः पूरी गिनती में भी प्रमुखता से उल्लिखित है। अरबी भाषा में भी भारत की इस संस्कृतमूलक अंकगणना की पद्धति को हिन्दसः कहा गया है अर्थात जो हिन्द देश से अरबवासियों को मिली।
अंत में शाह शब्द की वयुत्पत्ति पर प्रामाणिक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व के अभिलेखीय स्रोतों के आधार पर चर्चा होनी आवश्यक है। इसमें कनिष्क के द्वारा शहंशाह जैसी पदवी धारण किए जाने जैसा शब्द एक या दो अभिलेखों में दिखाई पड़ता है। इसे सहानुसाही या शाहानुशाही भी कुछ जगहों पर अंकित पाया गया है। कनिष्क के शहंशाह या सहानुसाही की चर्चा के पूर्व मिनांडर की चर्चा आवश्यक है।
मिनांडर यूनानी राजा था जो 115ईसा पूर्व के लगभग भारत आया था। मिनांडर का अवगानिस्तान के शिनकोट में प्राकृत भाषा और खरोष्ठी लिपि में जो अभिलेख मिला है उसमें उसने महरजस यानी महाराजा उपाधि धारण की है। महाराजा शब्द ग्रीक राजा के पास कहां से पहुंचा अथवा उसे महाराजा उपाधि धारण करने की इच्छा क्यों हो गई, सहज अनुमान लगाया जा सकता है। पेशावर के युसुफज़ई यानी स्वात घाटी में राजा गोण्डोफरनीज़ का जो प्रस्तर अभिलेख मिला है उसमें गोण्डो या गुदुव्हर ने भी महरयस यानी महाराजा की उपाधि धारण की है। इसके सिक्के में लिखा है-महरज रजतिरज-त्रतरस-देवव्रतस गुदव्हरस। यानी भारतीय राजाओं और सम्राटों की तरह महाराजधिराज बनने की ललक उस समय संपूर्ण एशिया खण्ड में व्याप्त हो चली थी। कुषाणवंशी कनिष्क का जो ईस्वी सन 81 का प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में सारनाथ प्रतिमा अभिलेख मिला है, उसका प्रारंभ ही होता है-महरजस्य कनिकस्य।। कनिष्क का पाकिस्तान के बहावलपुर में जो खरोष्ठी लिपि में ताम्रपत्र मिला है, उसमें लिखा है-महरजस्य रजतिरजस्य देवपुत्रस्य कनिष्कस्य।।
हुविष्क का जो ईस्वी सन 28 का मथुरा प्रस्तर अभिलेख गोवर्धन परिक्रमा मार्ग से मिला है उसमें हुविष्क ने खुद को देवपुत्र शाही राजा घोषित किया है। षाहिस्य हुविष्कस्य। इस अभिलेख में हुविष्क ऐलान करता है कि उसके राज्य में प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को 100 ब्राह्मणों और अनाथों को प्रत्येक पुण्यशाला में भोजन का प्रबंध होना चाहिए। इस प्रकार हिन्दु और बौद्ध मतावलंबी शाही शासकों के नियंत्रण में अवगानिस्तान से लेकर ईरान तक का इलाका होना इन अभिलेखों से भी सिद्ध होता है। और ये शाही राजा अधिकांश स्थानों पर खुद को महाराजाधिराज कहे जाने के पक्ष में हैं जो सीधे तौर पर शाही होने का प्रतीक है। कनिष्क का जो 78 ईस्वी का आरा पाषाण लेख मिला है उसमें भी लिखा है-महरजस रजतिरजस देवपुत्रस्य कनिष्कस्य।।
इन सभी अभिलेखों में सम्राट समुद्रगुप्त का जो ईसवी सन 335-376 में स्थापित प्रयाग स्तंभ अभिलेख है जो इतिहास में प्रयाग प्रशस्ति के नाम से प्रसिद्ध है, यह कौशांबी में मिला था और इलाहाबाद यानी वर्तमान प्रयागराज के किले में बाद में स्थापित किया गया, इसमें समुद्रगुप्त की भारत दिग्विजय का महान विवरण प्राप्त होता है। इसमें सम्राट समुद्रगुप्त को संपूर्ण पृथ्वी का पोषण करने वाला घोषित किया गया है। इस अभिलेख को समुद्रगुप्त के महामात्य हरिषेण ने भारत दिग्विजय के उपरांत संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में अंकित कराया था। इस अभिलेख में अंकित है कि जो षाहानुशाही या शाओनाशाओ (शहंशाह) की उपाधि धारण करने वाले शासक थे, उन समेत भारत के सभी राजाओं ने समुद्रगुप्त के अखंड भारत विषयक चक्रवर्ती राज्य निर्माण अभियान के सम्मुख आत्म समर्पण कर दिया था। स्पष्ट है कि यह उल्लेख ईरान तक का शासन करने वाले स्वतंत्र होना चाह रहे कुषाण शासकों अथवा ईरानी शासकों के सन्दर्भ में किया गया है जो उस समय महाराजाधिराज के साथ-साथ शाहानुशाही यानी शहंशाह की उपाधि भी सगर्व धारण करते थे और सबके सब भारतीय शैव-वैष्णव अथवा बौद्ध-जैन मत-पंथों के ही अनुयायी थे।
प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख की पंक्ति संख्या 23 और 24 में उल्लेख आता है कि राजवंश प्रतिष्ठापनोद्भुत निखिल भुवनविचरण शान्तयशसः दैवपुत्रषाहिषानुषाहि-शकमुरुण् डैः सिंहलकादिभिश्च सर्वद्विप-वासिभिरात्मनिवेदनम्। । अर्थात समस्त संसार में व्याप्त महान यशवाला वह सम्राट समुद्रगुप्त था जिसके सम्मुख देवपुत्र शाहीशाहानुशाही वंश समेत शक-मुरुण्ड एवं सिंहल आदि समस्त सागरीय द्वीपों तक के राजाओं ने आत्म समर्पण किया…।
सम्राट समुद्रगुप्त की उपर्युक्त प्रयाग प्रशस्ति समेत ऊपर वर्णित अनेक अकाट्य प्रमाण सिद्ध करते हैं कि शाही राजवंश और शाही शब्द की उत्पत्तिमूलक धारणाएं भारत की अपनी संस्कृत भाषा व उससे उपजी अन्य भाषाओं के समन्वित संवाद प्रक्रिया का परिणाम हैं न कि इसकी वयुत्पत्ति ईरान या तुरान में हुई जैसा कि इरफान हबीब जैसे कथित मूर्धन्य इतिहासकार ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के शाह उपनाम को लेकर दावा किया है कि वह फारसी भाषा से उत्पन्न हुआ है।
उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट यह भी होता है कि फारसी भाषा की उत्पत्ति भी संस्कृत मूल से उसी प्रकार होती दिख रही है जैसे कि भारत की अन्य सभी भाषाओं की जननी के रूप में संस्कृत को सभी विद्वानों ने निर्विवाद रूप से मान्य कर रखा है। यही कारण है कि नेपाल से लेकर हिमालय से जुड़े उत्तराखंड, सिक्किम, असम समेत सभी प्रांतों और सुदूर विन्ध्य पर्वत श्रृंखला तक के गणराज्यों में शाह उपनाम धारण करने की परंपरा आज भी दिखती है। गुजरात व राजस्थान में भामाशाह जैसे व्यापारिक-व्यावसायिक प्रमुखों, धनिकों, पंजाब में सिख गुरु परंपरा के साधकों और देश के अनेक जनजातीय समूहों तक में अपने अपने स्वायत्त शासन के उपलक्ष्य में शाह अथवा शाही उपाधि पूर्व काल से धारण करने की परंपरा रही है जो कालांतर में प्रांतशः यात्रा करती हुई अनेक जाति-समूहों की पहचान बनकर विविध रूपों में भारत में जानी पहचानी गई और आज भी अनेकशः रूप में जीवित है।
( इस शोधपत्र के लेखक भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सेन्टेनियल चेयर प्रोफेसर पद पर आसीन है। संपर्क ईमेलः rakesh.varanasi@gmail.com)

