गंगा की पवित्रता
प्रचंड वेग से चलती है जो, इठलाती, नही डरती है वो।
चंचल, निर्मल, मुस्काती है जो, हर-हर गंगे कहलाती है वो।
मानव ने जिसका ना मोल किया, दूषित जल उसमें घोल दिया।
जो भी अपशिष्ट बचा मानव पर, सब कुछ गंगा में छोड़ दिया।
खड़ा हुआ मुद्दा गंगा पर, नई-नई मुहीम चली।
इतना दूषित गंगा का जल है, की नहीं कोई स्कीम चली।
क्यूँ सरकार ही सब कुछ सुनती है, जब जन-जन की इसमें गलती है।
हम मिलकर जब कदम बढ़ायेंगे, गंगा को वापस ले आयेंगे।
गंगा में कुछ ना बहायेंगे, हर किसी को ये बतलायेंगे।
पूजा के घाट अलग ही बनायेंगे, शव को जल में ना बहायेंगे।
कारखानों को सबक सिखायेंगे, पॉलिथीन को बंद करायेंगे।
फिर ढेरों पेड़ लगायेंगे, बारिश को ज़मीं पर बुलायेंगे।
तब गंगा फिर से अविरल होगी,
इस जग का पावन जल होगी।

