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UN की रिपोर्ट: ब्राजील के साओ पाउलो के बाद भारत के बैंगलोर में पानी की किल्लत का खतरा सबसे ज्यादा

जी, हाँ, आज जल दिवस है। हम सब बचपन से ही सुनते आ रहे हैं, ‘जल ही जीवन है’। लेकिन क्या इसी जीवन को बचाने के लिए हम कोई उपाय करते हैं? नहीं, हम इसे धरल्ले से बर्बाद करते जा रहे हैं। अभी हाल ही में यूएन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले समय में ब्राजील के साओ पाउलो और भारत के बैंगलोर में पानी कि किल्लत का खतरा सबसे ज्यादा होगा।

अभी आने वाले कुछ ही दिनों में केपटाउन में पानी खात्मे के कगार पर है। इसे ‘जीरो डे’ नाम दिया गया है। केपटाउन और साओ पाउलो में तो ये खतरा सूखे कि वजह से होगा, लेकिन बैंगलोर में यह खतरा खुद इंसानों द्वारा खड़ी की गई है। 25 साल हो गया इस दिवस को मनाते हुए। इस दिन को मनाने के पीछे मकसद यह था कि लोग इस दिवस से कुछ सिख लेकर अपने जीवन के लिए पानी के अस्तितव को बरक़रार रखेंगे।लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस बार जल दिवस कि थीम है, ‘नेचर फॉर वाटर’ इसका मतलब है इस समस्या का ऐसा समाधान खोजना जो प्रकृति पर ही आधारित हो। केपटाउन, कैलिफोर्निया से लेकर कोलकाता तक जैसे दुनिया में कई ऐसे शहर हैं जहा पानी की गंभीर समस्या खड़ी हो चुकी है।

दुनिया के कुछ ऐसे देश जहा साफ पानी की उपलब्धता सबसे कम
पानी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली अंतराष्ट्रीय संस्था वाटरएड की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्डस वाटर 2018: द वाटर गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक, युगांडा, नाइजीरिया, मोजांबिक, भारत और पाकिस्तान उन देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा लोग ऐसे हैं जिन्हे आधे घंटे का आना-जाना किए बगैर साफ पानी नहीं मिल पाता। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 16.3 करोड़ लोग साफ पानी से महरूम हैं। पिछले साल ये आंकड़ा 6 करोड़ 30 लाख लोगों का था। आंकड़ा बढ़ने के पीछे वजह यह है कि वो लोग जिन्हें अपने घर से पानी लाने में आधे घंटे लगते हैं उन्हें, यूएन के नियमों के मुताबिक पानी पहुंचने वाले लोगों कि श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

लोगों को पानी न मिलने कि मुख्य वजहें:-
– आर्थिक और राजनितिक प्राथमिकता की कमी
– पानी पहुंचाने और रखरखाव में सक्षम संस्थानों का अभाव
– बेअसरदार कर निर्धारण और शुल्क का न होना
– स्थान और भूमि स्वामित्व
– भेदभाव
– आपदा और विस्थापन

प्रकृति की इस समस्या को हम प्राकृतिक तरीके से ही सुलझा सकते हैं। आइए, जानते हैं कुछ उपाय-

प्रकृति आधारित समाधान से हम केवल पानी की आपूर्ति और उसकी गुणवत्ता को ही ठीक नहीं कर सकते हैं बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के असर को भी कम कर सकते हैं। सब लोगों को मिलकर इसका बीड़ा उठाना होगा।

अगर जल एकत्र करने वाली संरचनाएं विकसित की जाए तो इससे मिट्टी बदलेगी और जंगल फिर से उगेंगे। इससे वन के रकवे में भी इजाफा होगा।जमीं की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी और फसलों का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा होगा। वाष्पोत्सर्जन, बारिश और धरती द्वारा अवशोषण जैसी जटिल प्राकृतिक प्रक्रियाओं का पानी अभिन्न्य अंग है। धरती पर वनस्पतियों, घास और नम स्थानों के साथ जंगलों की ज्यादा से ज्यादा मौजूदगी जल चक्र को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

 

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