नारी तू नारायणी – #MeToo आंदोलन का एक पक्ष यह भी
पूरे विश्व में महिलाओं को सम्मान और अधिकार देने की बात होती है… लेकिन भारत में तो नारी की पूजा ही होती है। नारी का सम्मान प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। लेकिन #MeToo आंदोलन से समाज दो भागों में बँटता जा रहा है।
सन 2006 में Myspace पर शुरू हुआ #MeToo आंदोलन आजकल भारत में जोड़ पकड़ रहा है। इसकी वजह जो भी हो, लेकिन यह आंदोलन अपने आप में कई प्रश्न खड़ा करता है।
एक तरफ तो कॉमेडी शो का नाम पर अनेक तरह की अभद्रता को मनोरंजन के नाम पर स्वीकार कर लिया जाता है, और ऐसा अनेक महिलाओं की मौजूदगी में होता है। इसके अनेकों उदाहरण आपको यूट्यूब पर मिल जाएँगे। #MeToo वाले लोगों का ऐसे डार्क कॉमेडी के बारे में क्या विचार रखते हैं?
एक तरफ तो आप सेक्स को, महिलाओं को पश्चिमी सभ्यता के अनुरूप objectify करते हैं, दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति को पिछड़ा बता कर यौन उन्मुक्तता को बढ़ावा देते हैं। और वही डार्क कॉमेडी करने वाले जब उन महिलाओं का शोषण करते हैं, तो तथाकथित उदरवादी लोग इसपर या तो खामोश हो जाते हैं, या फिर सही ठहराने की कोशिश करते हैं। जो अपने आप में बहुत ही शर्मनाक है।
महिला-पुरुष के संबंधो पर भारत में कभी भी कुंठा नहीं रही है। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता की भोंडी नकल करने वाले लोगों ने अभिव्यक्ति के नाम पर नारी को उपभोग की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने आप को हर समाज का जिम्मेदार मनाने वाले मीडिया और प्रैस के लोगों ने बॉलीवुड के गाने में स्त्री की तुलना तंदूरी मुर्गी से करने पर कोई प्रश्न नहीं किया। यहाँ तक कि समाज में हो रहे अपराधों पर प्लेकार्ड उठाने वाली अभिनेत्री करीना ने ऐसे गाने पर अभिनय तक किया।
अब प्रश्न यह उठता है कि, क्या ये लोग जो पर्दे पर या अपने लाइव कॉमेडी शो में स्त्रियों को उपभोग कि वस्तु बना कर पेश करते हैं, वह #MeToo आंदोलन के दायरे में नहीं आता? क्या इस आंदोलन में भी सेलेक्टिविस्म है? डार्क कॉमेडी में वहाँ उपस्थित महिलाएँ दूसरी महिलाओं के ऊपर हुये भद्दे मज़ाक पर हँसती हैं, और जब वही जोकर उनके साथ कुछ करता है, तो केवल तब ही #MeToo की याद आती है?
तो क्या यह आंदोलन सहूलियत वाला आंदोलन है? जिस सिनेमा से पूरी जनता प्रभावित होती है, उसी सिनेमा के एक एक महिला चरित्र के मूल्य, वास्तविक जीवन से अगल हैं क्या? ये सब तो इस आंदोलन का शोर मचाने वाले लोगों के विरोधाभासी मूल्यों पर है। लेकिन, इस पूरे आंदोलन का एक दूसरा पक्ष भी है। जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।
इन परस्पर-विरोधी व्यवहारों के अलावा #MeToo आंदोलन का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसमें एक महिला के आरोप मात्र लगा देने से किसी भी पुरुष को दोषी मान लिया जाता है। इस आंदोलन का यह एकतरफा दोषारोपण पक्ष बहुत ही खतरनाक है, जिसके कारण अच्छे से अच्छे सार्वजनिक जीवन जीने वाले पुरुषों की क्षवि एक आरोप मात्र से धूमिल की जा सकती है।
इस दूसरे पक्ष पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। संभवतः भाजपा के सांसद उदित राज ने पहली बार इस पक्ष को उठाया है। आरोप लगाने वाली महिला कुछ भी आरोप लगा सकती है, हो सकता है उसके साथ ऐसा हुआ हो, या हो सकता है उसने ऐसा किसी मतलब के लिए किया हो… इस बात की सत्यता निर्धारित कौन करेगा?
और जब तक सत्यता निर्धारित हो सकेगी और आरोप लगाने वाली महिला गलत साबित हो पाएगी, तब तक जो आरोपी पुरुष है उसकी इज्ज़त पर बहुत बट्टा लग चुका होगा। उसकी सामाजिक और आर्थिक क्षति पहुँच चुकी होगी। उस स्थिति में #MeToo आंदोलनकारी उसकी भरपाई कर सकेंगे क्या?
और रही बात यौन अपराध करने की, तो #MeToo मूवमेंट के आंदोलनकारी भी किसी से कम नहीं हैं। क्रिस्टीना ग्रसिया नाम की महिला जो कैलिफोर्निया में #MeToo आंदोलन की प्रमुख चेहरा थी, उस पर भी अपने एक पुरुष सहकर्मी का शोषण करने का आरोप है।
भारत में तो कानून ही पक्षपात करता है। यहाँ तक कि भारत में रेप का कानून, पुरुषों को victim ही नहीं मानता। अगर कोई पुरुष किसी महिला द्वारा रेप का शिकार है, तो इसके लिए कोई कानून नहीं है। भारत में गलत आरोप लगाने वाली महिलाओं को आसानी से छूट मिल जाती है। जिन निर्दोष लोगों को बरी किया जाता है, उनकी भरपाई करने का कोई नहीं सोचता।
यौन-दुराचार बहुत ही गलत अपराध है, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन झूठ कि आड़ में दूसरों का नुकसान करने वालों को भी उतनी ही सजा मिलनी चाहिए। पूरा भारत अभी अभी एक पक्षपाती कानून ‘दलित उत्पीड़न एक्ट’ का सामना कर ही रहा था कि व्यक्ति के आरोपों पर ही किसी को दोषी घोषित करने का दूसरा तरीका #MeToo भी आ गया।
उम्मीद है कि जनता सोशल मीडिया के उन्माद की बजाय तार्किकता पर भी सोचना शुरू करेगी।


there are enough proof if your are referring tanushrees case particularly, media footages her practicing shots, MNS workers jumping on her car etc.. etc.. are there. May be some females are getting late to open up but something somewhere is wrong int he society happening.