मासूमियत झलकती हैFeatured Article News हिन्दी लेख 

मासूमियत झलकती है

उनकी झुर्रियां तजुर्बा बयां करती हैं लेकिन उनके हरकतों में मासूमियत झलकती है। उनके वह कांपते हाथ कोई धोखा नहीं है, सच्चाई कहते हैं उनकी झलकती मासूमियत की। आंखों देखा जब बस कंडक्टर को दिए जाने वाले किराए में हुए ₹2 की कमी पूरा करने के लिए वह बड़े ही मासूमियत से अपने झोले के सबसे नीचे रखे हुए पजामे की जेब को टटोलते हुए ₹100 की नोट लेकर कंडक्टर की घूरती आंखों को नम कर देते हैं जो 5 मिनट पहले यह देख रही थी कि वह बुजुर्ग जानबूझकर 2 रुपये देना नहीं चाहता।

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यह जीवन का वह पड़ाव होता है जिसे हम बचपना तो नहीं लेकिन हां तजुर्बे वाला बचपना अवश्य कह सकते हैं। जिसके पास बचपने के लिए भी पूरी जिंदगी का अनुभव होता है। इस तजुर्बे वाले बचपन को प्यार और देखभाल की आवश्यकता तो होती है, आखिर बचपना जो है भले ही तजुर्बा वाला क्यों ना हो। लेकिन यह तजुर्बे वाला बचपना हमें हर पल कुछ नया सिखा जाता है।

उनके द्वारा बोले गए मुहावरों कविताओं और कहानियों की वह लाइन है वह लाइनें सिर्फ मात्र लाइने नहीं होती बल्कि व उनके अनुभवों का परिणाम होती हैं जो वह हमें उन लाइनों के जरिए बता रहे होते हैं। परंतु अजीब विडंबना है कि भारतीय संस्कृति जहां श्रवण जैसे लाल भी पैदा हुए हैं जिन्होंने उस मासूमियत झलकती है से भरे बचपन की देखभाल के लिए क्या कुछ नहीं किया। वह इसलिए क्योंकि उन्हें उस तजुर्बे की कद्र थी।

वहीं वर्तमान समय की स्थिति यह हो गई है जहां इन तजुर्बों की कद्र करना तो दूर की बात है बल्कि उन्हें दर – दर की ठोकर खाने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है। युवाओं का देश कहे जाने वाले इस भारतवर्ष में इस समय कुल 728 वृद्धा आश्रम हैं। और आश्चर्य की बात यह है कि बीतते समय के साथ दिन- प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। जो कि हमारी संस्कृति और सभ्यता के लिए शर्मनाक है। बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचार पर आते दिन प्रतिदिन खबरें लज्जित करती हैं कि भारत युवाओं से भरा देश है। क्योंकि जिस देश के युवा उस तजुर्बे की कद्र नहीं कर सकते हैं वह उस देश की गरिमा को क्या बनाए रखेंगे?

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