भूल कर भी घर और मंदिर में दीपक को इस तरह से न जलाएं
इसमें कोई शक नहीं कि हर इंसान ईश्वर में आस्था जरूर रखता है। जी हां जिस ईश्वर ने हमें बनाया है और जो हमारे दुखो को खत्म करता है, उसका आभार मानना और उसकी पूजा करना बेहद जरुरी है। बहरहाल ईश्वर के प्रति अपनी आस्था दिखाने के लिए हम भगवान के सामने दीपक जलाते है और उन्हें नमन करते है। मगर हम आपकी जानकारी के लिए बता दे कि आपको भूल कर भी मंदिर में दीपक को इस तरह से नहीं जलाना चाहिए। यहाँ तक कि आपको अपने घर में भी सही तरीके से दीपक को जलाना चाहिए। बहरहाल कई बार ऐसा होता है कि जब हम घर में या किसी मंदिर में दीपक जलाते है, तब एक जलते हुए दीपक से ही दूसरा दीपक भी जला देते है।

घर और मंदिर में दीपक को ऐसे न जलाएं..
खास कर त्यौहारों के समय हम ऐसा ही करते है। मगर हम आपको बता दे कि ऐसा करना वास्तव में गलत माना जाता है। इसलिए मंदिर में दीपक को ऐसे तो बिलकुल भी न जलाएं और न ही घर में ऐसा करे। दरअसल धार्मिक शास्त्रों के अनुसार इंसान को यह गलती नहीं करनी चाहिए। वैसे भी हम जब मंदिर जाते है तब जलता हुआ दीपक देख कर उसी से दूसरा दीपक भी जला लेते है। गौरतलब है कि इस दौरान आपको पहले से जलते हुए दीपक से दूसरा दीयां नहीं जलाना चाहिए। वास्तव में ऐसा करना अशुभ ही माना जाता है। जी हां आपको अपनी माचिस की तीली से दूसरे दीयें को अलग से जलाना चाहिए। तभी आपको अपनी प्रार्थना का फल मिलेगा।
वैसे भी जब हम भगवान की प्रार्थना करते है तो इस दौरान न तो हमें समय के बारे में सोचना चाहिए और न ही किसी भी चीज को लेकर जल्दबाजी करनी चाहिए। वो कहते है न कि भगवान् भी अपने उन्ही भक्तो से ज्यादा प्रसन्न होते है, जो सब्र से काम लेते है और उनके हर इम्तिहान को पूरा कर लेते है। इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखे कि अगर आप किसी दूसरे के जलते हुए दीपक से अपना दीपक जलाएंगे, तो ऐसे में आपकी प्रार्थना का फल भी उसी व्यक्ति को मिल जाएगा। इसके इलावा घर के मंदिर में भी पहले से जलते हुए दीपक से दूसरा दीपक जलाने से आपकी प्रार्थना व्यर्थ जाती है और आपको अपनी प्रार्थना में मनाएगा हुआ फल नहीं मिलता।
इसलिए अगर हो सके तो भूल कर भी घर और मंदिर में दीपक को इस तरह से न जलाएं।
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hello everyone, my name is Rajni Goyal. i am a writer but on the other side i love music. to be very frank i also even don’t know what i want to do in my life. लेकिन अगर अपनी भाषा मैं कहूं तो…. भटकती हुई मुसाफिर हूँ, मंजिल की तलाश है, जहाँ मंजिल दिख जाएँ वही लिखा हमारी किस्मत का असली आगाज है।



