आर्थिक मोर्चे पर कौन सही ? राजीव राय बनाम नारायण मूर्ति
राजीव राय बनाम नारायण मूर्ति: भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन वाला सपना देने वाले प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना हो या फिर ऑटो सेक्टर स्लोडाउन के बाद अर्थव्यवस्था में आई एक कमजोरी का दौर किस वास्तविकता के भविष्य की उम्मीद की ओर नजर डालें एक आम भारतीय नागरिक के लिए यह थोड़ी अचरज की बात है। फिर भी समझने क्या एक प्रयास करते हैं।
एक सामान्य सा आदमी जो अखबार पढ़ कर या टीवी देख कर अपनी धारणा बनाता है उसके लिए तथ्यों और तर्कों के भंवर वाले अर्थशास्त्र को हर तरीके से समझ पाना एक टेढ़ी खीर है। ऐसे में एक सामान्य व्यक्ति बुद्धिजीवी वर्ग की ओर नजर रखता है कि वह टीवी , सार्वजनिक मंच, किताब ,लेख , बयान के जरिए एक विशेष मुद्दे पर अपनी राय , अपने दृश्टिकोण को रखते हैं।
राजीव राय बनाम नारायण मूर्ति : किसकी बात किस पर भारी ?
ऐसे में आर्थिक जगत के दो दिग्गजों के बयान पिछले दिनों सामने आए एक हैं नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार और दूसरे हैं देश की सबसे बड़ी आईटी एमएनसी इंफोसिस के संस्थापक एम नारायण मूर्ति। एक बुद्धिजीवी ने भारत की धूमिल होती आर्थिक छवि को दर्शाया और घबराहट का संकेत दिया तो दूसरे ने इसके विपरीत दिशा में जाकर एक आशावादी और उज्जवल भविष्य का प्रतिबिम्ब पेश किया।
पहली बात रखी नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने , जिन्होंने बीते बृहस्पतिवार को कहा कि- “देश में ऐसी आर्थिक स्थिति पिछले 70 सालों में कभी नहीं हुई , पूरी वित्तीय प्रणाली जोखिम भरे स्तर पर पहुंच चुकी है और सरकार को ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे निजी क्षेत्र की कंपनियों की आशंकाओं को दूर किया जा सके ,उनका किसी पर भरोसा नहीं रहा है निजी क्षेत्र के भीतर कोई भी क़र्ज़ देने को तैयार नहीं है हर कोई नगदी लेकर बैठा है ऐसे में आपको लीक से हटकर कुछ कदम उठाने की जरूरत है।”
इसके बाद उन्होंने जब जान लिया कि इस बयान से सरकार की छवि को धक्का पहुंचा है और वह बैकफुट पर है , उसके लिए खुद को डिफेंड करना मुश्किल हो रहा है तो खुद को संभालते हुए राजीव कुमार ने अपने बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाला घीसा-पीटा बहाना सफाई के रूप में गढ दिया और लोगों से ना घबराने की बात कह डाली।
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दूसरी बात की जानी चाहिए इंफोसिस के संस्थापक एम नारायण मूर्ति की जिन्होंने कहा कि पिछले 300 सालों में ऐसा अवसर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कभी नहीं आया है जब गरीबी को दूर किया जा सके। यह स्वर्णिम मौका है कि हम गरीबी उन्मूलन के लिए कार्य कर सके और उसे जड़ से मिटा सके।
उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि 300 सालों में पहली बार ऐसा आर्थिक माहौल पैदा हुआ है जिसमें विश्वास बना है कि हम गरीबी खत्म कर सकते हैं और भारत को एक बेहतर भविष्य दे सकते हैं यदि हम जमकर प्रयास करें तो हम गरीब बच्चों की आंखों के आंसू को सकते हैं जैसा कि महात्मा गांधी चाहते थे। इस बयान से साफ हुआ कि नारायण मूर्ति ने भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के दौर को सिरे से खारिज कर दिया और उसको सर्वश्रेष्ठ स्वरुप में मानते हुए गरीबी खत्म करने का सबसे विश्वसनीय अवसर माना।
यह दो बुद्धिजीवियों के बात थी जिनका अपना महत्व और स्थान है। एक देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी के संस्थापक तो दूसरे भारत सरकार के थिंक टैंक जहाँ से योजनाएं बनती है उस नीति आयोग के उपाध्यक्ष है। एक नकारात्मक बात करता लेकिन पहली बात पर दूसरे संभाल कर बात को संशोधित कर सामने आया किसकी बात मानने की बात नहीं यह तो एक व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है इतना जरूर है देश की आर्थिक स्थिति इतनी भी बुरी नहीं बताई जा रही है इतनी भी अच्छी नहीं जितना आदर्शवाद की जा रही है।

Web Journalist
Ex- Punjab Kesari, Bihar Express, Unacademy

