160 साल बाद इलाहाबाद का नाम प्रयागराज पड़ा
भारत देश का एक महत्वपूर्ण स्थान जो राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक दृष्टि से अपना विशेष स्थान रखता है । ऐसे शहर इलाहाबाद को प्रयागराज के नाम से जाना जाएगा । यह नाम पौराणिक औऱ ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है ।
इलाहाबाद वही शहर है जहाँ पर ब्रह्मा जी ने अपनी यज्ञस्थली बनाई थी । यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आर्य ने यहाँ भी अपनी बस्तियों के निर्माण किया था ।
गौरतलब है कि कुछ मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी ने अपना सबसे पहला बलिदान यही पर दिया था । इसी वजह से इसका नाम प्रयाग पड़ा जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ बलिदान दिया गया हो ।
स्वतंत्रता की लड़ाई का केंद्र भी इलाहाबाद ही था । ऐसा इतिहास के द्वारा परिलक्षित है कि राजा हर्षवर्धन जो कि वर्धन साम्राज्य राजा थे । इनके राज में 644 ईसवी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने अपने यात्रा विवरण में पो-लो-ये-किया नाम के शहर का जिक्र किया है, जिसे इलाहाबाद माना जाता है ।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित महामना मदनमोहन मालवीय ने अंग्रेजों के शासनकाल में सबसे पहले इस बारे में आवाज़ उठाये थे कि इलाहाबाद का नाम बदलना चाहिए इसके बाद भारत में उपस्थित अन्य संस्थाओं ने इस पर अपनी आवाज़ बुलंद की । ग़ौरतलब है कि मालवीय जी ने ही इलाहाबाद का नाम बदलने की कवायद शुरू की । बता दे कि इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम फिर से छेड़ी गयी । इस मुहिम में महंत नरेंद्र गिरी का नाम भी आगे आता है जो अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष है ।
ऐसा माना जाता है कि दो नदियों के संगम वाले शहर में राजा शिलादित्य (राजा हर्ष) द्वारा कराए एक स्नान का जिक्र भी किया गया है। यह प्रयाग के कुम्भ मेले का सबसे पुराना और अद्वितीय एवं ऐतिहासिक दस्तावेज माना गया है ।
भारत की आज़ादी के बाद बने पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के सामने भी इलाहबाद के नाम को बदलने की सिफारिश रखी गई थी।

